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सरकारी संवेदनहीनता की गाथा

तवलीन सिंह Updated Tue, 17 Oct 2017 09:11 AM IST
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तवलीन सिंह
मुंबई के एक फुटपाथ पर दो बच्चे रहते हैं, जिनकी गाथा सरकारी संवेदनहीनता की गाथा है। इनकी कहानी सुनकर शायद आपको भी विश्वास होने लगेगा कि प्रधानमंत्री का संदेश अभी तक उनके मुख्यमंत्रियों तक नहीं पहुंचा है। प्रधानमंत्री अपने हर भाषण में दोहराते हैं कि उनकी सरकार की प्राथमिकता देश के सबसे गरीब लोगों की कठिनाइयों को संवेदनशील दृष्टि से देखना है। दूसरी तरफ उनके मुख्यमंत्री हैं, जो अब भी उन सरकारी संस्थाओं में परिवर्तन नहीं ला पाए, जिनकी जिम्मेदारी गरीबों की मदद करना है।


सूरज की उम्र दस वर्ष है। उसकी मां नहीं है और उसके पिता अपाहिज हैं। मेरी की उम्र छह वर्ष है और उसकी मां संगीता एक ऐसे व्यक्ति से ब्याही है, जो दिन-रात शराब के नशे में पड़ा रहता है। सो एक दिन वह मेरे पास अपनी बेटी और छोटे भाई को किसी सुरक्षित निजी बाल भवन में डालने की मांग लेकर लाई। मैं मानिक दावर नाम के एक नेक व्यक्ति को जानती हूं, जो बीजे होम नाम की संस्था चलाते हैं, जिसमें मेरी और सूरज जैसे बच्चों के रहने और पढ़ने के लिए इतनी अच्छी व्यवस्था है कि उनके नन्हे जीवन नर्क से स्वर्ग बन जाते हैं। मानिक ने पहले भी चार बच्चियों को बीजे होम में लेकर मेरी मदद की थी और इस बार भी वह इन दो बच्चों को अपने होम में लेने के लिए तैयार थे।


समस्या केवल यह थी कि महाराष्ट्र सरकार की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की इजाजत लिए बिना मैं बच्चों को बीजे होम में नहीं डाल सकती थी। सो संगीता और बच्चों को साथ लेकर मैं दशहरे से पहले इस उम्मीद में वहां हाजिर हुई कि दिवाली तक उनके जीवन में उजाला आ जाएगा। कमेटी में मैं पहले दिन पहुंची, तो अधिकारी ने संगीता की दरख्वास्त लेने से इसलिए इन्कार कर दिया, क्योंकि वह दरख्वास्त मंैने अंग्रेजी में लिखा था। सरकारी रौब दिखाते हुए उसने कहा, ‘इसकी लिखावट में क्यों नहीं है यह दरख्वास्त? बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र भी चाहिए और उनके घर के पते का सबूत भी।’ मैंने कहा कि संगीता अनपढ़ है, बच्चों का जन्म फुटपाथ पर हुआ है, सो कोई प्रमाणपत्र नहीं है, और घर के पते का सबूत इसलिए नहीं है, क्योंकि वे फुटपाथ पर रहते हैं। मेरी बातों से अधिकारी नाराज हो गए और हमें बाहर निकाल दिया।


इसके बाद संगीता मराठी में दरख्वास्त लिखकर और बच्चों को साथ लेकर चार बार कमेटी में गई, पर हर बार उसे निकाल दिया गया। मुझे वह दोबारा साथ लेकर वहां गई, तो अधिकारियों ने अकड़ दिखाते हुए कहा कि अब आधार कार्ड भी चाहिए और अपने पति के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर की कॉपी भी। जांच करने का काम उस संस्था का होता है, जहां बच्चों को जगह मिलती है। जब मैंने यह बात कही, तो सीडब्ल्यूसी के अधिकारी और भी अकड़ गए और बड़ी मुश्किल से दरख्वास्त लेने के लिए राजी हुए। वे देख सकते थे कि संगीता की बार-बार वहां आने की क्षमता नहीं थी। वे देख सकते थे कि बार-बार बच्चों को लाना कितना मुश्किल था। उनके क्रोधित स्वर से बच्चे बेहद डर जाते थे। पर मैंने एक बार भी उनके चेहरे पर संवेदनशीलता नहीं देखी। सरकारी अधिकारी होने के नाते वे कुछ भी कर सकते थे और हम नागरिक होने के नाते कुछ भी नहीं।


दिवाली आने को है और बच्चे अब भी फुटपाथ पर पड़े हुए हैं। वे अगर बीजे होम में होते, तो पहली बार उनके जीवन में दिवाली के दीये जलते, उन्हें कपड़े और मिठाइयां मिलतीं तथा बचपन की दिवाली का पहली बार मजा मिलता।
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