आर्थिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश को सबसे उपयुक्त राज्य माना जाता था, क्योंकि हिमाचल प्रदेश हजारों करोड़ों का व्यवसाय अकेले खेती-बाड़ी से करता है। हिमालय के सेब हों, कीवी हों या अन्य उत्पाद, जो फल और फूलों से जुड़े हैं, उन्होंने दुनिया भर में अपनी जगह बनाई है। हिमाचल प्रदेश विभिन्न सब्जियों के लिए भी जाना जाता रहा है। यही नहीं, लंबे समय से यह राज्य पर्यटकों को आकर्षित करता रहा है, जो इसकी आर्थिकी का स्तंभ बना। नतीजतन सरकारें पर्यटन को लेकर और गंभीर हुईं और फिर ऐसे ढांचागत विकास के पीछे पड़ गईं, जिससे अर्थव्यवस्था तो मजबूत हो ही, राज्य की सुंदरता में भी चार चांद लग जाएं। लेकिन यह भुला दिया गया कि यह हिमालयी राज्य है, जिसकी बोझ ढोने की अपनी सीमाएं हैं। इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत इसलिए भी है कि हिमालय अभी खुद बनने की स्थिति में है। लेकिन विकास के मतवालों ने इसकी अनदेखी कर दी। इसमें सिर्फ सरकारों का ही दोष नहीं है, क्योंकि सरकारों का चुनाव लोगों द्वारा ही किया जाता है।
उत्तराखंड राज्य की मांग के पीछे भी यही कारण था कि पहाड़ के क्षेत्र में विकास नहीं हुआ है। हिमाचल ने कृषि से लेकर पर्यटन तक बहुत विकास किया, लेकिन इस बार मानसून ने यह दिखा दिया कि पहाड़ी शहरों (चाहे मंडी हो या शिमला या अन्य छोटे-मोटे शहर) में विकास का मौजूदा मॉडल हिमाचल प्रदेश के लिए उपयुक्त नहीं है। अब इसे स्वीकारा नहीं जा सकता, क्योंकि जिस तरह से हिमाचल प्रदेश में तबाही मची है, उसका संकेत यही है कि अब भी सोचिए-समझिए कि हिमालयी राज्यों में विकास कैसा होना चाहिए?
वैसे बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तबाही मचाई है। जिस देश ने भी विकास की अंधी दौड़ लगाई, वह कहीं न कहीं पर्यावरण की अनदेखी के कारण प्राकृतिक संकट से पीड़ित हुआ है। समुद्री तापक्रम जिस हद तक बढ़ चुका है, उसके चलते अल नीनो और ला नीना का प्रभाव देखने को मिल रहा है। दोनों ही बड़े संकट लाने वाले हैं। इनके चलते अतिवृष्टि या सूखे का प्रभाव झेलना पड़ता है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी भी ज्यादा सटीक और असरदार नहीं होती। जब भी पर्यावरण पर संकट आता है, उसका पहला असर पर्वतीय क्षेत्रों पर पड़ता है। चाहे अंटार्कटिका हो, आर्कटिक हो या थर्ड पोल के रूप में हिमालय हो, इन सबको पर्यावरण संकट का असर झेलना पड़ा।
किसी भी जलवायु परिवर्तन की अनियमितताओं का पहाड़ी क्षेत्रों को सबसे ज्यादा सामना करना पड़ता है, जैसा कि अभी पूरे हिमालयी राज्यों में देखा गया। हिमालयी क्षेत्र में तापमान की वृद्धि से जहां ग्लेशियर के हिमखंडों के पिघलने की रफ्तार बढ़ती है, वहीं स्थानीय प्रकृति में भी बदलाव आते हैं, जिससे ढांचागत विकास प्रभावित होता है।
यही समय है कि हमें हिमालयी क्षेत्र में विकास का पर्यावरण अनुकूल मॉडल अपनाना चाहिए, ताकि हम उनके पर्यावरण की रक्षा के साथ आर्थिक सुरक्षा भी दे सकें। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हिमालय हवा, मिट्टी, जंगल, पानी के लिए देश-दुनिया का सबसे बड़ा खजाना है। अगर हमने इसके संसाधनों पर चोट की, तो हमारे अस्तित्व की रक्षा असंभव है। हिमालय दिवस पर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को जानने-समझने का प्रयत्न होना चाहिए।