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'लीफ स्टॉर्म' - गाब्रियल गार्सिया मार्केज

Sat, 20 Dec 2014 09:03 PM IST
ओम गुप्ता
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स्पेनिश लेखक गाब्रियल गार्सिया मार्केज की हर किताब के कवर पर उनका नाम भारी-भरकम अक्षरों में और किताब का टाइटल छोटे से बारीक अक्षरों छापा जाता है। पाठक उनकी खरीद से पहले उसे टटोलता नहीं है, बस उनका नाम देखकर खरीद लेता है। कोई अचंभा नहीं कि उनके उपन्यास और कहानी संग्रह उपभाषाओं में अनूदित होकर करोड़ों पाठकों के दिलो-दिमाग में घर कर चुके हैं। एक और मजे की बात। उनके अधिकांश नॉवेल एक काल्पनिक शहर माकोंदो में परवान चढ़े हैं। इस शहर के लोग बाकी दीन-दुनिया से अनजान हैं। वे अपनी चारदीवारी में मस्त हैं। न कोई शहर छोड़कर जाता है और न ही कोई नया आदमी बाहर से आता है। आए, जाए भी तो कैसे? बाहर की जिंदगी का उनसे कोई संपर्क ही नहीं है।  उनके जीवन में केवल एक सुखद घटना घटती है। नए बच्चे का जन्म। और एक दुर्घटना उन्हें परेशान कर देती है, किसी एक की मृत्यु।
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'लीफ स्टॉर्म' उपन्यास में भी उनके शहर के एकमात्र डॉक्टर की मौत होती है। सारा शहर उस डॉक्टर से नफरत करता था। उसकी आदतों, चरित्र और आचरण के कारण। कभी-कभी तो शक होता था कि वह डॉक्टर है भी? क्या उसके पास कोई डिग्री भी थी? अकेला डॉक्टर होने के कारण मरीज उसके पास जाने के लिए विवश थे। कभी-कभी लोग ठीक भी हो जाते थे। डॉक्टर की मौत एक ऐतिहासिक घटना थी। यह खबर आग की तरह फैली और सारे शहर को झुलसा गई। कोई भी उसे पसंद नहीं करता था, लेकिन हर कोई उसके जनाजे में शरीक होना चाहता था। कब्रिस्तान तक न सही, कुछ कदम तो जनाजे के पीछे जरूर चलना चाहिए था। ताकि बूढ़े होने पर अपने बच्चों को बता सकें कि वे भी इस यादगार हादसे के चश्मदीद गवाह थे। जो लोग चल-फिर नहीं सकते थे, वे अपने छज्जों पर लटक गए थे और तब तक लटके रहे, जब तक कि आखिरी सफर का अंतिम यात्री आंखों से ओझल नहीं हो गया। माकोंदो में एक इज्जतदार कर्नल रहता था। कर्नल ऑरोलियानो बुएंदिया। वो एक सहृदय इंसान था। उसने डॉक्टर के मरते ही उसकी तमाम बुराइयों को नजरअंदाज करते हुए फैसला लिया कि उसे एक सम्मानजनक तरीके से दफनाया जाए। और वह उस मुहिम में जुट गया। 'लीफ स्टॉर्म' उपन्यास का कलेवर और बानगी देखिए-

“वह दोपहर हमारे घर में एक कहानी की तरह उतरी थी। डॉक्टर की मौत ने हमें हैरान नहीं किया था। हमें इसका लंबे समय से इंतजार था, लेकिन यह हमारे घर को इस तरह हाल-बेहाल कर देगा, इसका हमें अंदाजा भी नहीं था। किसी को तो मेरे सथ जनाजे में जाना था और मैंने सोचा था कि मेरी बीवी तो जाएगी ही। उसने उस मौके पर चांदी की मूठ वाली मेरी वो बेंत ढूंढ निकाली थी, जो मेरी बीमारी के दिनों में खरीदी गई थी। उसके ऊपर एक नाचने वाली का खिलौना बना हुआ था। उसे ठोंक-पीटकर दुरूस्त कर लिया गया। जब वह नाचती थी, तो संगीत भी बजता था। मेरी बीवी आदेलाइदा ने मुग्ध होकर वह गीत-संगीत सुना और देखा। उसी लम्हा उसने मेरी ओर देखा। उसकी आंखे नम थी और उनमें उदासी भरी हुई थी। संगीत में भी दर्द था। ऐसे में उन्हें डॉक्टर की याद आई। वह तो यहीं तो रहता था। बंद गली के आखिरी मकान में। हमें पता था, एक दिन वह मर जाएगा और हमें उसे दफनाना होगा। हमें जाना होगा पर अब तक तो वह जमीन के नीचे हमेशा के लिए सो गया होगा।”
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया विश्लेषक और संस्कृतिकर्मी हैं।)
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