पिछले हफ्ते पहली बार कराची में दो पाकिस्तानियों को गिरफ्तार किया गया, जो चरम कट्टरपंथी समूह इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए सीरिया जाने की कोशिश में थे। पाकिस्तान आधिकारिक तौर पर इस्लामिक स्टेट को दाइश कहता है, क्योंकि इस आतंकी गुट में इस्लामिक कुछ भी नहीं है। विगत फरवरी में विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान में इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए इसे मुल्क के लिए गंभीर खतरा बताया था।
ऐसी खबरें आईं कि दाइश समर्थक नारों के साथ उसे समर्थन करने के आह्वान वाले पर्चे पाकिस्तान के उत्तरी इलाकों में देखे गए। दाइश की मंशा इस पूरे इलाके को एक प्रांत के रूप में एकजुट कर खुरासान खलीफा का नाम देने की है। दाइश मानता है कि पाकिस्तान, भारत, ईरान और मध्य एशियाई देश खुरासान के हिस्से हैं। गिरफ्तार किए गए ये दोनों पाकिस्तानी स्वयंभू कट्टरपंथी एवं शिक्षित हैं, जिन्हें ईरान में गिरफ्तार किया गया और फिर सिंध पुलिस के आतंकवाद निरोधी विभाग को सौंप दिया गया। पुलिस कहती है कि दाइश ने दुनिया भर के लड़ाकों को लुभाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया है।
पुलिस कहती है कि पाकिस्तान में ऐसा मामला इससे पहले नहीं देखा गया और उनके बारे में जब कुछ सूचनाएं मिलीं, तो उन्हें गिरफ्तार किया गया। उसने बताया, 'भविष्य में मुल्क के लिए यह बड़ी चुनौती होगी। इसका नाम बड़ा है। अल कायदा का भी नाम है, लेकिन आईएस बड़ा नाम है।' लंदन में रॉयल यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस ऐंड सिक्योरिटी को संबोधित करते हुए पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने कहा, 'इस्लामाबाद में ऐसे लोग हैं, जो आईएस के प्रति अपनी निष्ठा दिखाना चाहते हैं। यह एक खतरनाक घटना है। जहां तक आईएस की बात है, पाकिस्तान में उसकी परछाईं तक को पैर पसारने की इजाजत नहीं मिलेगी।'
एशिया कॉन्फ्लिक्ट रिपोर्ट के मुताबिक, आईएस इस्लामी खलीफा की बहाली के विचार को भुना रहा है, जो दक्षिण पूर्व एशिया और दुनिया भर में रूढ़िवादी मुसलमानों के लिए एक जबर्दस्त प्रतीकात्मक और भावनात्मक अपील है।
अफगानिस्तान की पश्चिमी सीमा पर विभिन्न शहरों एवं गांवों में आईएस के झंडे लहरा रहे हैं और यह रहस्य नहीं है कि यह खूंखार आतंकवादी गुट काफी मजबूत है। अराजकता और उथल-पुथल वाले अफगानिस्तान में आईएस के लिए पैठ बनाने में कोई मुश्किल नहीं होगी। अब यह देखने वाली बात होगी कि अफगान तालिबान उनसे लड़ते हैं या उनमें शामिल होने के लिए समझौते करते हैं। अगर ऐसा हुआ, तो अफगानिस्तान का अंत हो जाएगा, जिसका सुरक्षा बल काफी कमजोर है। आईएस तालिबान के लिए चुनौती बन सकता है, क्योंकि उसके पास ऊर्जावान युवा लड़ाके हैं, धन की बहुतायत है और अरब देशों का मजबूत समर्थन है।
खुफिया विभाग द्वारा कई भारतीयों के आईएस के साथ लड़ने का संदेह जताए जाने के बाद भारत में भी कई युवकों को गिरफ्तार किया गया। महाराष्ट्र के कल्याण जिले में आईएस के लिए रंगरूटों की भर्ती की खबरें आईं, जहां से पिछले वर्ष फहाद तनवीर शेख, आरिफ फैयाज मजीद, शहीम फारूकी टंकी और अमान नईम टंडेल 23 मई, 2014 को बगदाद भाग गए थे, जो घर से इराक के धार्मिक स्थल देखने की बात कहकर गए थे। मजीद को पिछले दिनों मुंबई लौटने पर गिरफ्तार कर लिया गया। सुखद यह है कि इन युवाओं के अभिभावक गृह मंत्रालय के साथ सहयोग कर रहे हैं। भारत सरकार भी उन युवाओं को दंडित करने के बजाय उनके साथ नरम रवैया अपनाने की योजना बना रही है।
हाल ही में आईएस ने ढाका के राजनयिक क्षेत्र में एक इतालवी राहत कार्यकर्ता की हत्या की जिम्मेदारी ली है। ऑस्ट्रेलिया एवं ग्रेट ब्रिटेन ने बांग्लादेश में रह रहे अपने नागरिकों को पहले ही आईएस के प्रति चेतावनी दे दी है। मलयेशिया से आई खबरों के मुताबिक, सत्तर मलयेशियाई सैन्यकर्मी आईएस में शामिल हुए हैं।
सितंबर के आखिरी हफ्ते में दुनिया भर के नेता संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहुंचे और बारी-बारी से सबने भाषण दिया। वे विभिन्न मुद्दों पर बोले, कुछ ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भाषण दिया, तो बाकियों ने बहुपक्षीय मुद्दों पर बोला। क्या वह आईएस के आसन्न खतरे पर एक सुर में बोलने के लिए उचित मंच नहीं था? क्या द्विपक्षीय समस्याओं को पीछे रखकर आईएस के खतरे पर सभी नेताओं को बात नहीं करनी चाहिए थी, जो सभी मुल्कों के लिए खतरा है? पश्चिमी देश भी इससे राहत नहीं पा सकते। वास्तव में बड़ी संख्या में पुरुष और स्त्री, खासकर ब्रिटेन से आईएस के पक्ष में लड़ने सीरिया गए हैं। निश्चित रूप से संयुक्त राष्ट्र में सभी देशों ने एक मौका गंवा दिया।
इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सुसैन राइस जब पाकिस्तान आई थीं, तो उन्होंने आईएस की वैश्विक मौजूदगी से लड़ने के लिए एक नए अमेरिकी सैन्य गठबंधन में शामिल होने के लिए अपने मेजबान को विश्वास में लिया था। पाकिस्तानी अधिकारी के मुताबिक, शीघ्र ही उस गठबंधन के बारे में ह्वाइट हाउस की ओर से घोषणा होने की उम्मीद है और पाकिस्तान अपने सभी घरेलू पक्षों से सलाह करके उस गठबंधन में शामिल होने का फैसला करेगा। उन्होंने आगे बताया कि आईएस अफगानिस्तान में मौजूद है और वह आतंकी गुटों के साथ गहरा सहयोग बनाए हुए है। यदि उसे नहीं रोका गया, तो वे पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं। चाहे पाकिस्तान हो, अफगानिस्तान, भारत या बांग्लादेश-कोई भी मुल्क अकेले आईएस का मुकाबला नहीं कर सकता। बुद्धिमानी इसी में है कि ये सभी मुल्क दुनिया के अन्य देशों के साथ मिलकर इस बुराई से लड़ने के लिए गंभीर निर्णय लें।
आईएस का खतरा वास्तविक है, लेकिन इस क्षेत्र का नेतृत्व क्या वास्तव में इस खतरे के प्रति जागरूक है?
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं