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निस्तेज नेता और उदासीन मतदाता

Mon, 04 May 2015 07:41 PM IST
विजय राणा
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इस देश में, जहां बिना किसी पूर्व सूचना के कोई किसी के घर नहीं आता, जब पिछले शुक्रवार को गहराते अंधेरे में दरवाजे की घंटी बजी, तो आश्चर्य हुआ कि साढ़े सात बजे कौन आया है? दरवाजा खोला, तो मैंने स्थानीय कंजरवेटिव सांसद मैरी मेक्लाउड को दो अन्य लोगों के साथ सामने खड़े पाया। वह वोट मांगने आई थीं। तब कहीं जाकर मुझे एहसास हुआ कि इस देश में चुनाव हो रहे हैं। यहां न शोर-शराबा है, न कहीं नारेबाजी, न सड़कों पर पोस्टर और न गली-मुहल्लों की दीवारों पर उम्मीदवारों के मनभावन आश्वासन लिखे गए हैं। सिर्फ टीवी समाचारों और अखबारों से इस बात का एहसास होता है कि ब्रिटेन में चुनाव हो रहे हैं।
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इस बार कंजरवेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को विपक्षी लेबर पार्टी के नेता एड मिलिबैंड कड़ी चुनौती दे रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में कंजरवेटिव पार्टी ने मामूली बढ़त हासिल की है, पर कई विश्लेषक मानते हैं कि इस बार कोई भी पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर सकेगी। ऐसे में, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (लिब डेम), यूनाइटेड किंगडम इंडिपेंडेंट पार्टी (यूकेआईपी), स्कॉटिश नेशनल पार्टी (एसएनपी) और अन्य छोटी पार्टियों की अहम भूमिका होगी। दक्षिणपंथी यूकेआईपी, जहां कंजरवेटिव पार्टी के उम्मीदवारों को हारने का काम कर सकती है, वहीं स्कॉटलैंड की आजादी का सपना देखने वाली एसएनपी अपनी लोकप्रिय नेता निकोला स्टरजन के नेतृत्व में स्कॉटलैंड से लेबर पार्टी का सफाया कर सकती है। बेशक अभी कंजरवेटिव और लेबर, दोनों पार्टियों के नेता यह कह रहे हैं कि वे किसी अन्य दलों के साथ गठजोड़ के लिए अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं करेंगे, मगर यह तय है कि छोटी पार्टियां अपने समर्थन की भारी कीमत वसूल करेंगी और गठबंधन सरकार लंबी समझौता वार्ताओं के बाद ही संभव होगी।

जहां तक नीतियों का सवाल है, तो प्रधानमंत्री कैमरन का कहना है कि उनकी भावी सरकार अगले पांच वर्षों में घाटे की अर्थव्यवस्था को समाप्त करेगी, सरकारी व्यय में भारी कटौती करेगी, वर्ष 2020 तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा को अतिरिक्त आठ अरब पाउंड मुहैया कराएगी, ब्रिटेन में विदेशी अप्रवासियों के आगमन को सख्ती से नियंत्रित करेगी और यूरोपीय संघ में ब्रिटेन की सदस्यता के सवाल पर जनमत संग्रह कराएगी। उधर विपक्षी लेबर पार्टी का आरोप है कि भावी केमरन सरकार अगले पांच वर्षों में सरकारी व्यय में 12 अरब पाउंड की कटौती करेगी, जिसके लिए चाइल्ड बेनिफिट, सरकारी पेंशन और गरीबों के लिए बेरोजगारी और आवासीय भत्ते जैसी सेवाओं में कटौतियां की जाएंगी। यानी विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि कंजरवेटिव सरकार की आर्थिक कटौतियों की मार सिर्फ गरीबों पर पड़ेगी। बीबीसी के एक कार्यक्रम में तो एक दर्शक ने कैमरन से साफ कह दिया कि गरीबी और अमीरी के फर्क को समझने के लिए उनकी सोच में नैतिकता का अभाव है। असल में, ब्रिटेन में अब भी उदार वामपंथियों का एक बड़ा वर्ग है, जो कंजरवेटिव पार्टी को अमीर-परस्त मानता है।
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उधर मिलिबैंड के नेतृत्व में लेबर पार्टी मतदाता को यह आश्वासन देने में विफल साबित हो रही है कि वह ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकती है। उल्लेखनीय है कि 2010 में सत्ता छोड़ने से पहले पिछली लेबर सरकार के खजाना (वित्त) मंत्री लियेम ब्रायन ने अपने उत्तराधिकारी के नाम एक पत्र छोड़ा था, जिसमें सिर्फ यह लिखा था, 'पैसा बिल्कुल नहीं बचा है'। हालांकि वह एक मजाक था, लेकिन लेबर विरोधी इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं। पिछली टेलीविजन बहस में मिलिबैंड को उस समय निरुत्तर होना पड़ा, जब उनसे पूछा गया कि आमदनी से ज्यादा खर्च करने वाली पिछली लेबर सरकारों के इतिहास को देखते हुए मतदाता उनके हाथों में अर्थव्यवस्था की बागडोर कैसे सौंप सकते हैं? बेशक मिलिबैंड की राजनीतिक ईमानदारी की कद्र है, पर उनके पास न तो कैमरन जैसा प्रभावशाली व्यक्तित्व है, और न ही तेजतर्रार वाक क्षमता। जिस देश में चुनाव मुख्यतः टेलीविजन के परदे पर लड़ा जाता हो, वहां ये दो कमियां रास्ते में बाधा बन सकती हैं।

चुनाव में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) दूसरा बड़ा मुद्दा है। लेबर पार्टी का आरोप है कि प्रधानमंत्री कैमरन की सरकार पिछले दरवाजे से स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करना चाहती है। जवाब में कैमरन इस सेवा पर आठ अरब पाउंड खर्च करने का आश्वासन दे रहे हैं। मगर वह यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि इतना धन आखिर जुटाया कैसे जाएगा?

वैसे दोनों बड़ी पार्टियां अल्पसंख्यक मतों के लिए भी भारी जद्दोजहद कर रही हैं। इस बार 168 सीटों पर जातीय अल्पसंख्यकों के मत निर्णायक साबित हो सकते हैं। पिछले चुनाव में कंजरवेटिव पार्टी की ओर से अश्वेत और एशियाई मूल के 11 सांसद जीते थे, जबकि लेबर पार्टी के 16 सांसद। इस बार भी कंजरवेटिव पार्टी ने 56 और लेबर पार्टी ने 52 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं।

बहरहाल, दक्षिणी लंदन में अल्पसंख्यकों की एक सभा में प्रधानमंत्री कैमरन ने कहा, 'आखिरकार हमारी ही पार्टी ने इस देश को पहली महिला प्रधानमंत्री दिया है, और हमारी पार्टी ने ही पहला यहूदी प्रधानमंत्री भी दिया है। मैं जानता हूं कि एक दिन ऐसा भी आएगा, जब हमारी कंजरवेटिव पार्टी इस देश को अश्वेत या एशियाई मूल का प्रधानमंत्री देगी।' कैमरन का यह आशावाद हम भारतीय प्रवासियों को सुखद क्यों न लगे, लेकिन अभी वह दिन बहुत दूर है। इसकी वजह भी है। आखिर आज भी ब्रिटेन में बसे विदेशी मूल के अप्रवासी बड़ी संख्या में लेबर पार्टी का ही समर्थन करते हैं। फिर चाहे अतीत में लेबर पार्टी ने भी कड़े अप्रवासी कानून क्यों न बनाए हों।
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-लंदन स्थित वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी के पूर्व रेडियो संपादक और अब एनआरआईएफएम डॉट कॉम के संपादक
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