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भाषा बनाम बोली का विवाद

उमेश चतुर्वेदी Updated Tue, 24 Apr 2018 07:05 PM IST
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उमेश चतुर्वेदी
जैसे-जैसे स्थानीयता का बोध बढ़ रहा है, हिंदी बनाम क्षेत्रीय भाषाओं की लड़ाई बढ़ती जा रही है। पटना में मैथिली को हिंदी की बोली बताने की कोशिश से उपजा विवाद और उसे लेकर एक प्रोफेसर के मुंह पर कालिख पोतने के पीछे यही आधार प्रमुख रूप से काम करता रहा है।


अठारहवीं सदी से साहित्य और सामान्य प्रशासन की भाषा बनती और गढ़ती रही हिंदी को लेकर उसके ही क्षेत्र की कुछ भाषाओं और बोलियों में स्वाभिमान बोध इतना बढ़ गया है कि वे हिंदी के सामने अपनी स्वतंत्र अस्मिता का दावा करने लगी हैं। मैथिली वैसे भी संविधान की आठवीं अनुसूची की सम्मानित भाषा है। लेकिन करीब डेढ़-दो करोड़ लोगों की इस बोली-भाषा के साथ इन दिनों अस्मिताबोध इतना गहरा हुआ है कि इसे हिंदीतर भाषा मानने का आग्रह बढ़ता जा रहा है। 


दरअसल हिंदी को लेकर सामान्य पाठ्यक्रमों में सुनीति कुमार चटर्जी और जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के उस वर्गीकरण को ही पढ़ाया जाता है, जिसमें हिंदी की बोलियों के तौर पर राजस्थानी, अवधी, मैथिली, बघेली, हरियाणवी आदि को पढ़ाया जाता है। यह भी पढ़ाया जाता है कि जिस बोली के पास शिष्ट साहित्य होता है, उसे भाषा कहते हैं। दरअसल यह वर्गीकरण भेद ही भाषा बनाम बोली के विवाद की जड़ है। अब भाषा वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि भाषा बनाम बोली का विवाद बेवजह का है।


दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रहे स्लोवेनिया के ल्जूब्लजाना विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान के प्रोफेसर अरुण प्रकाश मिश्र बोली और भाषा के तर्क को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि बोली से भाषा बनती है न कि भाषा से बोली। 


गांधी जी को हिंदी को लेकर स्थानीय भाषाओं से भावी खतरे की आशंका थी। शायद यही वजह है कि उन्होंने 31 जनवरी, 1929 को यंग इंडिया में लिखा था, 'यह बात अब सभी को स्पष्टतया समझ लेनी चाहिए कि हिंदी को प्रादेशिक भाषाओं का कतई स्थान नहीं लेना है, उसे तो अंतरप्रांत की अधिकृत भाषा का स्थान लेना और प्रांतीय विचार विनिमय का माध्यम बनना है। गांधी जी के अनन्य सहयोगी रहे बनारसी दास चतुर्वेदी को भी भान था कि जब तक आजादी का आंदोलन चल रहा है, हिंदी को स्थानीय अस्मिताबोध से चोट नहीं पहुंचेगी। 


लेकिन आजाद भारत में भाषा बनाम बोली के बहाने हिंदी और स्थानीय भाषाओं का टंटा खड़ा हो सकता है। इसलिए उन्होंने भाषाओं के जनपदीय आंदोलन की अवधारणा दी थी। जिसमें सभी भाषाएं अपनी पूरी स्वायत्तता के साथ विकास करतीं और सम्मिलित रूप से हिंदी को समृद्ध करते हुए केंद्रीय भाषा के तौर पर विकास करतीं। लेकिन दुर्भाग्यवश हमने इस हिंदी सेवी और मनीषी की बातों पर गौर नहीं किया।


मैथिली को हिंदी की बोली बताने वाले आयोजन में किसी प्रोफेसर के मुंह पर कालिख पोतना मैथिली जैसी भाषा के समर्थक का सही कदम नहीं माना जा सकता। जिस भाषा के रचनाकार अपनी कोमल-कांत पदावली के लिए विख्यात हों, जहां मंडन मिश्र और शंकराचार्य के दुर्धष शास्त्रार्थ की परंपरा हो, उसके समर्थक से बौद्धिक विरोध की उम्मीद की जाती है। कालिख पोतने वालों को शायद पता न हो कि डॉक्टर रामबिलास शर्मा हिंदी जाति की भाषा में मैथिली को भी हिंदी की ही बोली मानते हैं। लेकिन इसका विरोध बाबा नागार्जुन करते रहे और उसका जरिया उन्होंने शास्त्रार्थ को बनाया था, कालिख को नहीं।
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