भारतवर्ष में पंचायतें अतीत काल से हैं। समय के अनुसार उनका स्वरूप बदलता रहा। संविधान सभा में पंचायतों को आजाद भारत के संविधान का हिस्सा बनाया जाए या नहीं, इस पर बड़ी जद्दोजहद भी हुई। महात्मा गांधी इसके पक्ष में थे। लेकिन उनको लग रहा था कि सदस्यों में पंचायतों के प्रति कोई जोश नहीं है।
गांधी जी इस तथ्य को भांप गए थे। प्रसिद्ध गांधीवादी डॉ॰ जे. डी. सेठी ने लिखा है कि जब गांधी जी को लगा कि पंचायतों को संविधान के अंतर्गत नहीं रखा जा रहा है, तो उन्होंने कांग्रेसियों से कहा था कि मेरे पास सलाह-मशविरे के लिए आने की जरूरत नहीं। इसलिए महात्मा गांधी को खुश करने के लिए पंचायतों को संविधान में रखा गया। दूसरी ओर डॉ॰ बी. आर. आंबेडकर पंचायतों के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि गांव में दलितों की व अन्य कमजोर वर्गों की समस्या बढ़ेगी। खैर गंभीर विचार-विमर्श के बाद पंचायतों को संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत रखा गया।
देश आजाद हो गया। पंचायतें संविधान का हिस्सा बन गईं। लेकिन पंचायतों की ओर कोई तवज्जो नहीं दी गई। ग्रामीण समाज के लिए नौकरशाही आधारित कार्यक्रम शुरू किए गए, जिसमें सामुदायिक विकास मुख्य था। जिसका डर था, वही हुआ। कार्यक्रम में लोगों की भागीदारी नहीं थी। कैसे लोगों की भागीदारी विकास के कार्यक्रमों में सुनिश्चित की जाए, इसके लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया।
इस समिति ने सुझाव दिया कि देश में तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (ग्राम स्तर, ब्लॉक स्तर व जिला स्तर) शुरू की जाए। राजस्थान के नागोर जिले से जवाहर लाल नेहरू द्वारा पंचायती राज व्यवस्था की बुनियाद रखी गई। कुछ राज्य जैसे पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक व राजस्थान ने पंचायतों के बारे में जोश दिखाया, जो ज्यादा समय तक नहीं रह सका। वर्ष 1977 में केंद्र में जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता समिति गठित की, जिसने यह बताया कि पंचायतों के पतन का मुख्य कारण नेता एवं नौकरशाही है।
ये दोनों नहीं चाहते कि सत्ता का कोई तीसरा केंद्र उभरे, पंचायतें अगर सशक्त बनेंगी, तो वे इन दोनों की जवाबदेही सुनिश्चित कर सकती हैं। कुल मिलाकर पंचायतों का हाल बेहाल ही रहा। खैर 1986 में एल. एम. सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई और उस समिति ने सुझाव दिया कि पंचायतों को संविधान की नौवीं अनुसूची में रखा जाए और इनमें समाज के कमजोर तबकों की भागीदारी के साथ-साथ अधिकार एवं शक्तियां भी दी जाएं। अंततः काफी प्रक्रियाओं के बाद 24 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद 73वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू हुआ।
आज 24 अप्रैल को पंचायतों को संविधान का अंग बने चौथाई सदी पूरी होने जा रही है। आइए देखते हैं कि पंचायतें क्या वैसी बन पाईं जैसी कि संविधान संशोधन की मंशा थी। पच्चीस वर्षों में लगभग आठ लाख दलित एवं आदिवासी व 11 लाख से अधिक महिलाएं पंचायतों में सदस्य एवं अध्यक्षों के रूप में चुनकर आए हैं।
इस समय गांव की हर गली में चुना हुआ प्रतिनिधि है। कुछ जगह पंचायतों में अच्छे कार्य भी हुए हैं जहां पर नौकरशाही एवं पंचायतों में सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं या नागरिक समाज का सहयोग रहा है। लेकिन ये अपवाद ही है। केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय ने 2015-16 में विकेंद्रीकृत रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में कोई भी ऐसा राज्य नहीं है जिसकी पंचायतों को सशक्त करने के लिए 100 अंक दिए जाएं।
पूरे देश में देखें, तो केरल पंचायतों को सशक्त करने में सबसे आगे है, उसके बाद कर्नाटक व अन्य राज्य आते हैं। सवाल यह उठता है कि देश में 31 लाख एवं 27 हजार पंचायत प्रतिनिधि, जो दो लाख 47 हजार ग्राम पंचायतों में, 6,283 पंचायत समितियों या क्षेत्र पंचायतों में व 595 जिला पंचायतों में क्या कर रहे हैं? संक्षेप में कहें, तो अधिकतर जगहों पर नौकरशाही के मात्र ठेकेदार बन कर रह गए हैं। पंचायती राज की जगह 'कलेक्टर या डीसी राज' कहें तो ज्यादा बेहतर होगा।
मजे की बात यह है कि पंचायतों के पास जो पैसा जा रहा है, वह उनका न होकर केंद्र सरकार एवं राज्य-सरकारों के कार्यक्रमों का है। उनमें पंचायतें एजेंसी के रूप में कार्य करती हैं, अपनी ओर से कोई निर्णय नहीं ले सकतीं। उदाहरण के लिए, मनरेगा का 50 प्रतिशत व्यय ग्राम पंचायत द्वारा किया जाएगा। लेकिन इसकी मंजूरी ब्लॉक विकास अधिकारी देगा। तो सत्ता किसके पास हुई, विकास ब्लॉक विकास अधिकारी के पास या ग्राम पंचायतों के पास?
विकेंद्रीकृत रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में ग्राम पंचायतों के पास अपने कार्यालय भवन नहीं हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारें पंचायतों को सशक्त करने में कितनी रुचि रखती हैं। जहां गांव समाज, जाति, वर्ग में बंटा है, महिलाएं भी असुरक्षित महसूस करती हैं। कैसे पंचायतों की बैठक प्रधान या सरपंच के घर हो सकती है? और अगर प्रधान गरीब परिवार से है, तो वह कैसे अपने घर पर ग्राम-पंचायत की बैठक बुलाएगा! ऐसे में पंचायती राज या तो ग्राम सचिव के थैले में होगा या प्रधान की अलमारी में होगा। पंचायतों के पास पर्याप्त कर्मचारियों का भी अभाव है।
महिलाओं, अनुसूचित-जाति एवं जनजातियों की भागीदारी नाममात्र है। सब जगह ‘प्रॉक्सी’ राज है। जीएसटी के बारे में कहा गया कि यह सहकारी संघवाद को प्रोत्साहित करेगा, लेकिन इसमें दो लाख 47 हजार पंचायतों की कोई भागीदारी नहीं है। क्यों नहीं पंचायतों के तीनों स्तरों के कार्य, कर्मी, संसाधन की अलग से सूची बनाई जाए? साथ ही ग्राम पंचायतों को उनकी आबादी के आधार पर फिर से गठन करने की जरूरत है। इससे भी अधिक जरूरी है कि पंचायत प्रतिनिधि खासतौर पर पंचायत सदस्य सवाल करना सीखें। बस सवाल करना सीखें।
-लेखक भारतीय आर्थिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं