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पहले से पस्त टीम कैसे दिलाएगी विश्व कप

Sat, 07 Feb 2015 12:21 AM IST
कुमार प्रशांत
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अपनी दुकान समेटने में लगा कप्तान और बिखरते हुए खिलाड़ियों को जोड़कर बनाई गई टीम कभी विश्व कप नहीं जीत सकती! इसलिए यह विश्व कप तो गया हाथ से! हमारी टीम पिछले दो महीनों से ऑस्ट्रेलिया में है और लगातार खेल रही है, लेकिन अब तक एक मैच भी जीत नहीं सकी है। और अब इंतजार कर रहे हैं कि कब और कैसे ऑस्ट्रेलिया से बाहर निकलें! यही तो कहा है कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने।
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हमारी टीम का इतने पहले ऑस्ट्रेलिया पहुंचना इसलिए जरूरी माना गया था कि टीम नई है, तो उसे ऑस्ट्रेलियाई पिच को देखने-समझने का मौका मिले। जब आप इतने पहले से वहां पहुंचे गए, तो वह सब तो हुआ ही होगा, जो सोचा गया था। मगर ऐसा क्यों है कि हमें लग ही नहीं रहा है कि कुछ हुआ भी है? जो मैदान में हैं, वह विराट कोहली, मैदान भरने भर को कप्तान हैं, जो मैदान में रहते-नहीं रहते हैं, वह महेंद्र सिंह धोनी, कप्तान माने जा रहे हैं। मैदान से बाहर रहने वाले इशांत शर्मा गेंदबाजी का हमारा सबसे बड़ा हथियार है, जबकि मोहम्मद सामी या उमेश यादव जैसे खिलाड़ी, जो मैदान में हैं, अटकती-भटकती गेंदें फेंक रहे हैं। इसी तरह, कोच डंकन फ्लेचर टीम के साथ कब, कहां और क्यों होते हैं, यह पता करना संभव नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया की पिचों का हाल यह है कि वे ठोस होती हैं, जिन पर गेंद तेजी से उठती है, और उसे योजनापूर्वक काटी घास की मदद मिल जाए, तो वह तेजी से कटती भी हैं। हमारे यहां की सुस्त पिचें इसलिए हमारे खिलाड़ियों की असली क्षमता माप नहीं पातीं, इसलिए हमें आसानी से ‘सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज’ मिलते रहते हैं। लेकिन ये सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज इंग्लैंड, वेस्ट इंडीज, ऑस्ट्रेलिया की पिचों पर सांस भी नहीं खींच पाते। ऐसी हालत में सारा दारोमदार कोच व कप्तान पर होता है, पर हाल यह है कि टीम के लिए 200 रनों के आसपास पहुंचना भी कठिन हो रहा है।
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ऑस्ट्रेलिया की पिचों पर 200 रन बनाने का मतलब है, अपने गेंदबाजों को फांसी पर चढ़ा देना! इंग्लैंड ने जिस मैच में हमें हरा कर ट्राई सीरीज से बाहर कर दिया, उसमें दरिद्रता हमारी गेंदबाजी में नहीं, बल्लेबाजी में थी। गेंदबाजों को आपको इतने रन देने ही होंगे कि बाज वक्त वे कुछ रन लुटाकर भी विकेट निकाल सकें। यही पेच था, जिसे 60 दिनों से ज्यादा लंबे ऑस्ट्रेलिया-प्रवास में धोनी-फ्लेचर को सुलझाना था। मगर वे ऐसा कुछ करते नजर नहीं आए।

तेजी से उठती और बाहर निकलती गेंदें हमारी बड़ी कमजोरी रही हैं। जब टीम का होश गुम हो और पिच आग उगलती हो, तो ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत होती है, जो विकेट पर टिके रहना जानते हों। मगर हालात यहां के भी सही नहीं हैं। ट्राई सीरीज में हार के बाद कप्तान धोनी ने यह नहीं कहा कि खिलाड़ियों या रणनीति में वे क्या कमी पाते हैं या क्या बदलाव करने की सोचते हैं, बल्कि उन्होंने एक ही बात कही कि हमें क्रिकेट से बचाओ! विश्व कप के दरवाजे पर खड़े होकर किस कप्तान ने ऐसी मांग की होगी और किस बोर्ड ने ऐसी मांग की, इतनी तत्परता से पूर्ति की होगी! आज भारतीय टीम एडिलेड के निकट के एक रिसोर्ट में, क्रिकेट और क्रिकेटबाजी से दूर, अपनी थकान, ऊब और दर्द मिटा रही है। लेकिन बमुश्किल दो सप्ताह बाद ही उन्हें विश्व कप के अग्निकुंड में कूदना है। लिहाजा आराम की यह रणनीति और विश्व कप की चुनौती का मेल कैसे बैठता है, हम भी देखेंगे।
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मुझे लगता है कि इस बार तो विश्व कप गया हाथ से, लेकिन मैं पूरी तरह गलत साबित होऊं, तो मुझसे ज्यादा आनंद किसे होगा! यही तो क्रिकेट है।
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