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जेहाद का हिस्सा बन गई कश्मीर समस्या

Sun, 31 Jul 2016 06:32 PM IST
तवलीन सिंह
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तवलीन सिंह
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पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर समस्या बदल गई है, लेकिन जब हमारे राजनेता इसका हल ढूंढने निकलते हैं, तो वही पुराने सुझाव देते हैं, जो 1947 से देते आए हैं। अगर ये सेक्युलर स्वभाव के होते हैं, तो उनका पहला सुझाव होता है कि हम पाकिस्तान की मदद के बिना कश्मीर का कभी स्थायी हल नहीं ढूंढ पाएंगे। इनका मतलब है कि बेशक हम कश्मीर को आजादी न दे सकें, लेकिन कम से कम इतना तो करना ही होगा कि सीमा को इतना नरम कर दिया जाए कि उन लोगों के लिए इधर से उधर जाना आसान हो जाए, जिनके परिवार बंटवारे में टूट गए थे। ऐसा सुझाव कई बार पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दे चुके थे। इन दिनों जब कश्मीर घाटी उबाल पर है, पूर्व गृह मंत्री  पी चिदंबरम अपने लेखों में भी यही सुझाव देते हैं। तथाकथित सांप्रदायिक स्वभाव के राजनेता अक्सर एक ही सुझाव देते हैं कि और मारो गद्दारों को, किसी हालात में पाकिस्तान से बात न करो। ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष अभी समझे नहीं हैं कि हमारी कश्मीर समस्या अब उस जिहाद का हिस्सा बन चुकी है, जो पूरी दुनिया में लड़ा जा रहा है।
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यह भी सुनने को मिला कि हाफिज सईद भारत से वीजा मांग रहे हैं, ताकि  उनकी संस्था के चिकित्सक कश्मीर घाटी में जाकर उनका इलाज कर सकें, जो सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में घायल हुए हैं। 26/11 वाले हमले के तार सीधे जुड़ते हैं, उसके संगठन लश्कर-ए तैयब्बा से। हाफिज सईद ने यह भी स्वीकार किया है कि बुरहान वानी उनके संपर्क में था। उसने अपने हर वीडियो में स्पष्ट कहा कि उसकी लड़ाई इस्लाम के लिए है, यानी कश्मीर को एक इस्लामी देश में तब्दील करने के लिए। बुरहान वानी अपने सभी वीडियो में आईएस के मुजाहिद जैसा दिखता है। वह इतना बड़ा हीरो बन गया कि उसके जनाने में हजारों कश्मीरी शामिल हुए और हिंसा पर उतारू हो गए। इसका मतलब यह है कि कश्मीर घाटी में जेहादी भावनाएं गहरी जड़ें जमा चुकी हैं।

लेकिन हमारी समस्या यह है कि मोदी सरकार की तरफ से ऐसा कोई संकेत हमने नहीं देखा, जिससे आश्वासन मिले कि प्रधानमंत्री समझ गए हैं कि कश्मीर समस्या एक नया रूप धारण कर चुकी है। प्रधानमंत्री चाहें, तो नए सिरे से इसका समाधान ढूंढने का काम कर सकते हैं, क्योंकि पुरानी गलतियों का दोष न उन पर लगेगा और न उनकी पार्टी पर। पिछले दो वर्षों के दौरान हमने नई कश्मीर नीति की सिर्फ एक झलक तब देखी, जब भाजपा ने मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाया। यह अच्छी पहल थी, लेकिन इसके बाद कुछ नहीं हुआ। बाढ़ राहत पहुंचाने में सुशासन दिखाने का अच्छा मौका था, लेकिन दिल्ली में जो राहत पैकेज तैयार किया गया, उसे श्रीनगर पहुंचने में पूरा एक वर्ष लगा, तब तक आम कश्मीरी समझ गए कि सुशासन सिर्फ कहने की बातें थीं।
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पिछले वर्ष जब कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों का हाल देखकर लौटी, तो भाजपा के एक बड़े नेता से पूछा कि इतने महीनों बाद भी राहत क्यों पहुंचाई गई, तो उन्होंने कहा कि पीएमओ और वित्त मंत्रालय के बीच तकरार चल रही थी। दोष किसका था, यह हम अब भी नहीं जानते। उसी दौरे में मैंने पहली बार बुरहान वानी का नाम सुना और यह भी सुना कि कुछ इलाके में उसका इतना प्रभाव है कि वहां मेरे जैसे 'भारत के पत्रकार' का जाना खतरे से खाली नहीं है। दिल्ली लौटकर जब उसके वीडियो देखे, तो पता चला कि उसकी लड़ाई आजादी के लिए नहीं, बल्कि कश्मीर में इस्लाम कायम करने की थी, जिसे इस्लामाबाद से पूरी सहायता मिलती थी।
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