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नए दौर में संघ-भाजपा के रिश्ते

Sun, 31 Jul 2016 06:29 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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नीलांजन मुखोपाध्याय
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पिछले हफ्ते दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार से जुड़े अन्य संगठनों के नेताओं के बीच देर रात तक बैठकों की एक शृंखला चली। ये बैठकें यह विश्लेषित करने का एक अवसर था कि संघ के भीतर सब कुछ ठीक चल रहा है। इस तरह की अटकलें फैली थीं कि संघ में रिश्ते तनावपूर्ण हो चले हैं, क्योंकि इन बैठकों में जो संगठन भाग ले रहे थे, उनमें भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) और स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) भी शामिल थे। भाजपा के साथ इन दोनों संगठनों के रिश्ते असहज होने का इतिहास है, खासकर तब, जब भाजपा सत्ता में होती है। रिश्तों की यह खटास 2004 में राजग की हार का एक प्रमुख कारण बन गई थी। पिछले हफ्ते की बैठकों ने इस डर को पुनर्जीवित कर दिया, क्योंकि बीएमएस और एसजेएम ने पिछले दो वर्षों में यह बयान देकर सरकार की आलोचना की है कि सरकार नव-उदारवादी नीतियों को आगे बढ़ा रही है-चाहे विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई की सीमा खत्म करना हो, श्रम सुधार हो या अन्य नीतियां। इस पर आगे बात करने से पहले संघ के भीतर के अंदरूनी समीकरणों और यह अन्य दूसरी पुरानी पार्टियों से किस तरह अलग है, इसे समझना जरूरी है।
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नहीं भूलना चाहिए कि भारत में हर राजनीतिक दल के अग्रणी संगठन हैं। इनके दो तरह के सहयोगी हैं-इकाइयां या प्रकोष्ठ (जैसे एनएसयूआई, भाजयुमो और एसएफआई जैसी इकाइयां) और क्षेत्र विशेष से संबंधित स्वतंत्र संगठन (एआईटीयूसी, सीआईटीयू और एआईडीडब्ल्यूए)। गैर-भाजपा दलों में इन क्षेत्र विशेष के स्वतंत्र संगठनों का अपने दलों, मसलन, कांग्रेस, माकपा या भाकपा से सीधा संपर्क होता है, लेकिन तकनीकी रूप से कानूनन ये स्वतंत्र निकाय हैं।

भाजपा का रिश्ता ज्यादा जटिल है, क्योंकि इसके सहयोगियों के दो समूह हैं। पहला, वे, जिनका नियंत्रण सीधे पार्टी द्वारा किया जाता है और भाजपा अध्यक्ष इनके पदाधिकारियों या संयोजकों की नियुक्ति करते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिला मोर्चा और किसान मोर्चा शामिल हैं। लेकिन भाजपा को उन संगठनों से भी तालमेल बिठाना पड़ता है, जो सीधे तौर पर पार्टी के नियंत्रण में नहीं हैं, लेकिन संघ परिवार का हिस्सा हैं। बीएमएस, एसजेएम और विहिप जैसे इन संगठनों का राजनीतिक रसूख जबर्दस्त है, क्योंकि इसके कार्यकर्ताओं की संख्या काफी है और ये चुनाव जीतने के लिए भाजपा के लिए जरूरी हैं। इनमें से कुछ सहयोगी सीधे संघ परिवार द्वारा स्थापित किए गए हैं-उदाहरण के लिए, बीएमएस और विहिप की ज्यादातर इकाई स्वयंसेवकों की अपनी पहल पर स्थापित की गई हैं और इन्हें संघ प्रेरित निकाय माना जाता है।
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संघ एवं इन सहयोगी संगठनों का रिश्ता पदानुक्रम आधारित है, लेकिन भाजपा का उनके साथ रिश्ता अजीब है, क्योंकि भले ही इनका समग्र राजनीतिक उद्देश्य राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना है, लेकिन वे विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट समस्याओं से निपटते हैं-ट्रेड यूनियन, आर्थिक नीति, धर्म, शिक्षा, इत्यादि। ये सहयोगी दो क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आर्थिक राष्ट्रवाद। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का काम देखने वाले संगठन राम मंदिर, लव जेहाद, गो रक्षा जैसे अभियानों के जरिये संस्कृति और धर्म का दावा करते हैं, जबकि आर्थिक राष्ट्रवाद की बात करने वाले संगठन एफडीआई, श्रम सुधार, मशीनीकरण आदि के विरोध पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। याद रहे कि बीएमएस का गठन गुरुजी एम एस गोलवलकर के व्यक्तिगत निर्देश पर 1950 के दशक में किया गया था और एसजेएम की शुरुआत तब हुई थी, जब बालासाहेब देवरस और रज्जू भैय्या 1990 के दशक की शुरुआत में दत्तोपंत ठेंगरी जैसे बड़े नेता के साथ संघ का संचालन कर रहे थे। तब स्वदेशी जागरण मंच बुद्धिजीवियों के उदार-वाम क्लब का प्रवेश द्वार बन गया और इसने यशवंत सिन्हा जैसे कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों को भाजपा में लाने का काम किया।

लेकिन यह समूह वाजपेयी शासन में नव-उदारवादी नीतियों के चलते हताश हो गया, जिन्होंने उदारीकरण की नीति को जारी रखा। जैसा कि हालिया बैठकों से संकेत मिलता है, ऐसी आशंका है कि यह विरोध फिर लौट रहा है। यह समझना चाहिए कि संघ नेतृत्व द्वारा भाजपा के सबसे करिश्माई नेता के रूप में नरेंद्र मोदी के उभार को स्वीकार करने और प्रधानमंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षा को मंजूरी देने के बाद दोनों के रिश्ते में गतिशीलता आई है। निस्संदेह दोनों के बीच रिश्ता संघ और वाजपेयी के बीच रिश्ते से कहीं ज्यादा बेहतर है। अब तक दोनों पक्षों ने वास्तविक टीम भावना को दर्शाया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी को संघ से विचार-विमर्श किए बिना किसी नीति को शुरू करने की छूट है।

 संघ एवं भाजपा के बीच सहयोग के बावजूद कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जिन पर दोनों में असहमति है। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि संघ एवं मोदी/भाजपा के उद्देश्य अलग हैं। मोदी का उद्देश्य अपेक्षाकृत अल्पकालीन है, जो सरकार की स्थिरता और नीतियों पर जोर देते हैं और 2019 में एक और कार्यकाल पाने की कोशिश में हैं। जबकि संघ का मौजूदा नेतृत्व मानता है कि उनका अंतिम लक्ष्य हिंदू राष्ट्र है, जो भले तुरंत हासिल नहीं होगा। इसलिए उनका नजरिया दोतरफा है-दीर्घकालीन उद्देश्य पर नजर रखो, पर यह मानकर चलो कि ऐसा भाजपा के शक्तिशाली हुए बिना नहीं होगा। इसके लिए सामंजस्य की जरूरत है, ताकि हर कोई संतुष्ट रहे और फिर से एकता न टूटे कि 2004 जैसा झटका लगे। इन बैठकों का परिणाम बताता है कि संघ नेतृत्व बीच का एक रास्ता निकालेगा, जो सबको स्वीकार्य होगा। भाजपा का तर्क है कि सरकार में होने के कारण उसकी कुछ सीमाएं हैं, क्योंकि उसे संविधान और देश के कानून का पालन करना है, जबकि बीएमएस, एसजेएम और विहिप ने सरकार से ज्यादा सक्रिय समर्थन की मांग की, ताकि वे अपने समर्थकों को संतुष्ट कर सकें। यह बहुत ही मुश्किल होगा, क्योंकि आगामी विधानसभा चुनावों और 2019 के चुनाव में जीत के लिए पूरे संघ परिवार का समर्थन जरूरी है। यह कैसे होगा, यह एक प्रमुख सवाल है। नीतियों को लेकर खींचतान जारी रहेगी, लेकिन परिदृश्य उतना संघर्षपूर्ण भी नहीं है कि भाजपा के विरोधियों की निराशा खत्म हो जाए।
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वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदीः द मैन, द टाइम्स के लेखक
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