जब हमारे देश के लोग अंग्रेजी हुकूमत से आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तो हम उनसे एक नैतिक हक मांग रहे थे कि भारतीयों को खुद के निर्णय लेने का हक होना चाहिए यानी राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन। तब हमारी मांग यह थी कि भारतीय लोगों की राय ही (अंग्रेजों की नहीं) यह तय करेगी कि यहां किसका राज हो।
कश्मीर जब भारत के साथ चलने के लिए तैयार हुआ, तब उसने कुछ शर्तें रखी थीं। उसमें से एक शर्त थी यह हक (राइट टू सेल्फ डेटर्मिनेशन) जताने का मौका उसे भी दिया जाएगा। हमारी आजादी की लड़ाई 1947 में खत्म हो गई, लेकिन कश्मीरियों के लिए जारी रही। कश्मीर में कश्मीर वादी के सुन्नी, कश्मीरी पंडित, लद्दाख के बौद्ध लोग, कारगिल के शिया, जम्मू के हिंदू और अन्य समुदाय (सिख भी!) के लोगों के भविष्य का सवाल है।