मॉस्को होटल में रहते हुए यह तीसरा दिन था कि रूसी कवि वोजनेसेस्की, जो अब तक अपना घनिष्ट मित्र बन चुका था, कमरे में आया और हमें अपने घर ले गया। उसका घर मॉस्को होटल से पैंतालिस मिनट की दूरी पर क्रासनो जेल्सकाजी नाम के उपनगर में था। भोजन के दौरान उसने बताया कि वहां की सरकार हमें अब लेनिनग्राद, ताशकंद (रूसी नाम ताशकेंत), आल्मा आटा, आर्मेनिया आदि कई प्रांतों में भेजेगी। उसने अपने घर उस शाम सोवियत संघ की अकादमी ऑफ सायसेज के यू स्वेव्कोव को भी आमंत्रित कर रखा था।
स्वेव्कोव ने सूरदास के पदों का रूसी में अनुवाद कर एक पुस्तक ‘ऑन द कंपोजीशन एंड जेनर ऑफ सूरदासेज सूरसागर’ प्रकाशित की है। हम लोगों के बीच सोवियत रूस की संस्कृति और भारत के रिश्ते को लेकर लंबी बातचीत हुई। वोजनेसेस्की जब हमें मॉस्को होटल छोड़ने आ रहा था तब उसने धीरे से यह भी बताया कि सोवियत संघ में दुभाषियों का काम करने वाले के.जी.वी से भी जुड़े होते हैं।
सोवियत संघ के विदेश मंत्रालय की यह नीति हमारी समझ में नहीं आई कि हम और रघुवीर सहाय पहले दो दिन तक तो मॉस्को होटल में साथ थे, मगर तीसरे दिन उन्हें ‘कीव’ भेज दिया गया, जबकि चौथे दिन हमें ताशकंद। इसका एक ही कारण हो सकता है कि हमें सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम के अंतर्गत भारत सरकार ने चार-पांच देशों की यात्रा पर भेजा था, जबकि रघुवीर जी साहित्य अकादमी की ओर से सिर्फ रूस यात्रा पर आए थे। अगले दिन हमारा यान जब ताशकंद हवाई अड्डे पर उतरा तो, जो दुभाषिनी हमें लेने आई थी उसने ‘नमस्ते’ कहकर हमारा स्वागत किया। उसने अपना एक लंबा सा नाम बताया, जिसे बोलने में हमारी जुबान की लड़खड़ाहट पर तरस खाकर उसने कहा, ‘आप मुझे सिर्फ ‘सो’ पुकारें। स्वभाव से वह चुलबुली थी।
अंग्रेजी बोलते-बोलते एक-दो शब्द हिंदी के भी बोल जाती थी। सो हमें पहले ताशकंद के संग्रहालय ले गई, फिर वहां की एक पाठशाला में जहां हिंदी पढ़ाई जाती है। शाम को राइटर्स यूनियन में काव्यपाठ आयोजित था। जहां अपने अलावा ताशकंद के स्थानीय कवि सुलेमानोव, इजानकुरोव और दीनोकरोल भी थे। दीनोकरोव वहां के वरिष्ठ कवि थे। उनके बाईस कविता संग्रह राइटर्स यूनियन छाप चुकी थी। दीनोकरोव की रचनाएं पोलिश, हंगेरियन, चेक और स्लोवाक आदि भाषाओं में अनुदित होकर इन्हीं देशों में बड़े चाव से पढ़ी जाती हैं। अगले दिन सो हमें शास्त्री चौक ले गई। उसने बताया कि जब वह बीस साल की थी, तब उसकी नियुक्ति दुभाषिनी के रूप में पहली बार सन् 1965 में हुई थी।
हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच जो संधिवार्ता, यहां जब हुई थी तब वह लाल बहादुर शास्त्री जी के आसपास रही। यह पूछने पर कि हमारे प्रधानमंत्री के साथ क्या हुआ? हम जानना चाह रहे थे कि उन्हें हृदयाघात हुआ अथवा इससे पहले कि हम जहर शब्द बोल पाते उसने हमें बीच में टोककर कहा, ‘यह तो यहां के उच्चाधिकारी ही जानें। हां, उनका खाना जरूर आपके टी.एन. कौल के यहां से आता था।’ उनके यहां बावर्ची कौन था? हमारे इस प्रश्न का भी कोई उत्तर न देकर सो ने तपाक से प्रतिप्रश्न करते हुए हमसे पूछा, ‘आज मैं कैसी लग रही हूं?’ उसके इस कूटनीतिक प्रश्न पर दो क्षण रुककर हमने कहा, ‘क्षमा करना।
इस समय तो हम अपने देश के विरल रत्न प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्युभूमि पर बने स्मारक के पास प्रणत मुद्रा में खड़े हैं। न भूलो, शोक संतप्त प्राणी को पूरी पृथ्वी श्मशान दिख पड़ती है।’ शास्त्री जी, जो सही अर्थों में महापुरुष थे, उन्हें विनयपूर्ण श्रद्धांजलि देकर जब हम कार में बैठने लगे, तो सहमे स्वर में सो ने पूछा, ‘युद्ध क्यों होते हैं?’
हमने कहा, ‘यही तो विपर्यास है-कहीं कोई बच्चा पैदा होता है, तो वह एक तरह की भावातीति में सांस ले रहा होता है। तभी हम उसके कान में कुछ रूढ़ किस्म के शब्द फूंक देते हैं। उसे हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी जैसे चौखटे में फिट कर देते हैं। एक सम्यक संपूर्ण मन को खंडित कर उसे रुग्ण या विमक्तमनस्क बना देते हैं। एक विशाल और गहरे समुद्र को अपनी मूढ़ता का जामा पहनाकर उसे एक पोखर बनकर जीने के लिए विवश कर देते हैं। परिणाम यह कि वह आजीवन युद्धग्रस्त रहता है।