पुतिन के बारे में काफी निरर्थक बातें लिखी जा रही हैं कि कैसे उन्होंने खुद को बराक ओबामा से ज्यादा मजबूत दिखाया या किस तरह अब ओबामा को अपना पुरुषार्थ दिखाने की जरूरत है।
हम पुतिन की ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर आंकते हैं और अपनी ताकत कमतर बता रहे हैं। जो भी यह मानता है कि सोवियत संघ का विघटन बीसवीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक आपदा था, उन सबके लिए यह एक ऐसी खतरनाक फैंटेसी है, जिसका अंत खुद पुतिन और उनके समर्थकों के लिए बदतर ही होगा।
सोवियत संघ का पतन ही इसलिए हुआ, क्योंकि साम्यवाद लोगों को बेहतर जीवन-शैली नहीं दे सकता था। बल्कि उसके पतन ने पूर्वी यूरोप एवं रूस में असीम ऊर्जा का संचार किया। पुतिन की बुद्धिमानी इसी में थी कि वह एक ऐसे रूस का पुनर्गठन करने की कोशिश करते, जिसकी व्यापक मानवीय प्रतिभा उन तमाम ऊर्जाओं का लाभ ले पाती।
बेहतर यही होता कि पुतिन रूस को भी यूरोपीय संघ में शामिल करने के लिए संघर्ष करते, जबकि वह यूक्रेन को उससे बाहर रखने के लिए लड़ रहे हैं! वह अपने लोगों की आकांक्षाओं के प्रति नरम रवैया अपनाने के दोषी हैं और रूस को माफिया संचालित तेल समृद्ध राज्य के रूप में चलाना पसंद करते हैं, जहां सभी अच्छी चीजों पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है।
इसलिए पुतिन अब अपने ही युवा लोगों और उन पड़ोसियों से लड़ रहे हैं, जो पुतिनवाद पर यूरोपीय संघ को तरजीह दे रहे हैं। पुतिन ने जिस तेजी से खुद को अमीर बनाया है, उतनी तेजी से अपने लोगों को नहीं। नतीजतन रूस की अर्थव्यवस्था वहां के नागरिकों की क्षमता के बजाय प्राकृतिक संसाधनों पर ज्यादा निर्भर हो गई है।
अगर कभी ईंधन की कीमत ध्वस्त होती है, तो इतिहास पुतिन को माफ नहीं करेगा। 'पुतिन ने ओबामा को पछाड़ा' जैसी शब्दावली का इस्तेमाल न करने के लिए मुझे माफ करें। यह कुश्ती का मुकाबला नहीं है। तथ्य यह है कि पुतिन ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया है।
मैं अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन के लिए रूस पर आर्थिक एवं कूटनीतिक प्रतिबंध लगाने का पक्षपाती हूं। क्रीमिया को लेकर जो बात परेशान करने वाली है, वह यह कि वहां पुतिनवाद के प्रति रुझान बढ़ा है, जिसे पहले सिर्फ रूस के लिए खतरा माना जाता था, लेकिन अब यह वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा बनता जा रहा है।
मैंने शीतयुद्ध के बाद रूस को नाटो में शामिल करने का विरोध किया था, क्योंकि तब रूस ज्यादा लोकतांत्रिक था। अमेरिका की उसी गलती ने पुतिन के उदय की नींव रखी। मैं पुतिन के साथ युद्ध के पक्ष में नहीं हूं, पर यही वक्त है, जब हम उनकी कमजोरी और अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकते हैं।
इसके तहत उनके शासन के दो महत्वपूर्ण स्तंभों-तेल और गैस पर चोट करने की जरूरत है। जिस तरह से 1980 के दशक में, सऊदी अरब की कोशिशों से, कच्चे तेल की व्यापक उपलब्धता ने वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट लाकर सोवियत साम्यवाद के पतन में मदद की थी, पुतिनवाद से निपटने के लिए वैसी ही दीर्घकालीन रणनीति अपनाने की जरूरत है।
हम प्राकृतिक गैस में निवेश बढ़ाकर और निर्यात में छूट की सुविधा देकर उस यूरोप को अपने ऊपर ज्यादा निर्भर बना सकते हैं, जो अभी रूस से अपनी जरूरत का तीस फीसदी गैस खरीदता है। इसी तरह गैसोलिन टैक्स बढ़ाकर और कार्बन टैक्स लाकर हम वैश्विक तेल कीमत को कम करने में मदद कर सकते हैं, जिससे हम मजबूत ही होंगे।
यदि हमें पुतिन को डराना है, तो तत्काल इन कदमों की घोषणा करनी होगी। जाहिर है, पुतिन को झुकाने के लिए हम कुछ भी करने में सक्षम हैं, और ऐसा कदम बहुत कठोर भी नहीं होगा।