जीवन धारा: जिससे बच नहीं सकते, उसकी निंदा नीति के विरुद्ध; जब तक भ्रम है तभी तक संसार है
प्रतापनारायण मिश्र
Published by: जलज मिश्रा
Updated Tue, 20 Feb 2024 07:38 AM IST
सार
साधारणत: जो धोखा खाता है, वह अपना कुछ न कुछ गंवा बैठता है, और जो धोखा देता है, उसकी एक न एक दिन कलई खुले बिना नहीं रहती है। हानि सहना व प्रतिष्ठा खोना, दोनों बातें बुरी हैं।
साधारण श्रेणी के लोग धोखे को अच्छा नहीं समझते; यद्यपि उससे बच नहीं सकते, क्योंकि जैसे काजल की कोठरी में रहने वाला बेदाग नहीं रह सकता, वैसे ही भ्रमात्मक भवसागर में रहनेवाले अल्पसामर्थी जीव का भ्रम से सर्वथा बचे रहना असंभव है, और जो जिससे बच नहीं सकता, उसकी निंदा करना नीति विरुद्ध है।