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अजीब-सी धुंध है ये: दस लाख से ज्यादा मतदाता होंगे प्रभावित

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Raman Singh Updated Tue, 30 Apr 2019 04:23 AM IST
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मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की भीड़

जड़ता के साथ ही ऊब बढ़ती जा रही है। और अभी तो 2019 के आम चुनाव के तीन चरण और 150 से भी अधिक सीटों के चुनाव बाकी हैं। तेज होती आवाजों ने अभियान को पटरी से उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस बीच, आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दे चुनाव के शोरगुल और गुबार में गुम हो गए हैं। दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में मकानों के खरीदार तेजी से खुद को ऐसी स्थिति में पा रहे हैं कि उनके पास अपने सपनों के घर का निर्माण पूरा होने का इंतजार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वहीं कुछ खरीदार अदालतों के दरवाजे खटखटा रहे हैं, उम्मीद और प्रार्थना कर रहे हैं कि फैसला भवन निर्माण किए जाने या रिफंड के रूप में आएगा। बेशक, द रियल एस्टेट (रेग्यूलेशन ऐंड डेवलपमेंट) ऐक्ट, 2016 ने रेरा की स्थापना की है और बिल्डरों और डेवलपर्स में धोखाधड़ी न करने को लेकर कानून का भय पैदा किया है। लेकिन उनका क्या जो रेरा के अंतर्गत नहीं आते?



एनरॉक कंसल्टेंट्स के अनुमान के मुताबिक 4.6 लाख करोड़ रुपये मूल्य की 5.75 लाख इकाइयां निर्माण के विभिन्न चरणों में अटकी हुई हैं, जिससे दस लाख से अधिक मतदाता प्रभावित होंगे। पिछले हफ्ते रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा है कि वे दिवालिया आईएल ऐंड एफएस को दिए कर्ज के ब्योरे घोषित करें, वह भी उसके भीतर पनप रही गड़बड़ियों के सामने आने और अंततः दिवालिया होने के नौ महीने बाद। इस विवादास्पद छद्म बैंक पर कर्जदाताओं का 94,216 करोड़ रुपये बकाया है और नया बोर्ड चाहता है कि इसका 90 फीसदी माफ कर दिया जाए।


बैंकों और बचतकर्ताओं तथा जमाकर्ताओं का जोखिम करीब पचास हजार करोड़ रुपये का है और इसमें से 35,382 करोड़ रुपये पहले से संकट में फंसे सार्वजनिक बैंकों के हैं। वैज्ञानिकों ने संभवतः यह बताने में सफलता हासिल कर ली है कि आखिर ब्लैक होल कैसा दिखता है। वहीं भारत के बैंकर ब्लैक होल्स की शिनाख्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दो अप्रैल को फंसे कर्ज (एनपीए) से संबंधित रिजर्व बैंक के 12 फरवरी, 2018 के परिपत्र को रद्द कर दिया। नतीजतन कर्ज के रूप में दिए गए 3.2 लाख करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन को अब परिभाषित नहीं किया जा सकता, अब न यह अच्छा है या बुरा। आखिर यह मुद्दा क्यों? भारत के बैंकों में जनता का 125 लाख करोड़ रुपये उनके खातों में जमा है। हां, यह जमा बीमा के जरिये सुरक्षित है, लेकिन अहम तथ्य यह भी है कि बीमा के तहत सिर्फ एक लाख रुपये का कवर है, बीमित खातों का मूल्य है 32,75,300 करोड़ रुपये और 31 मार्च, 2018 तक डिपाजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन के पास कुल 81,430 करोड़ रुपये थे।


हां, निहित सरकारी गारंटी है, लेकिन नियामकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे अपनी बात कहें ताकि प्रणालीगत सुरक्षा किसी सनक का शिकार न हो। जरा इस पर गौर करें जेट एयरवेज ने पिछले हफ्ते अपने विमान जमीन पर उतार दिए, जोकि 18 महीने से संकट से जूझ रही थी और जिस पर कर्जदाताओं का 12,000 करोड़ रुपये बकाया हैं। इस फंसे कर्ज का बड़ा हिस्सा जिन सरकारी बैंकों का है, उन्हें अभी यह एलान करना है कि ये खराब कर्ज है, क्योंकि वे किसी चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं!


सिर्फ बैंकों की बात नहीं है। कुछ हफ्ते से म्यूचुअल फंड भी अपने यूनिट धारकों को उनके निवेश को होने वाले संभावित नुकसान के बारे में बता रहे हैं, खासतौर से फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान के बारे में जो कि मध्य वर्ग का सबसे पसंदीदा निवेश है। सार यह है कि भारत की वित्तीय व्यवस्था में ढांचागत खामी है - दीर्घकालिक ऋण के लिए अल्पकालिक निधियों का उपयोग। जब विनियामक का र्रवाई से तंग आ चुके बैंक, उधार नहीं दे सकते थे, तो उधारकर्ताओं को गैर-बैंक-वित्त कंपनियों द्वारा सेवा दी जाती थी, जो फिर से बैंकों, जमाकर्ताओं और म्यूचुअल फंड से उधार लेते थे। म्यूचुअल फंड की चिंता यह है कि क्या पैसा वापस आएगा। इस वर्ष जनवरी में रेटिंग एजेंसी आईसीआरए ने छह म्यूचुअल फंड को आईएल ऐंड एफएस के सात हजार करोड़ रुपये के बकाए की वजह से निगरानी सूची में रखा था। इस महीने की शुरुआत में क्रिसिल ने डीएचएफएल की रेटिंग गिरा दी, क्योंकि वह फंड जुटाने में कमजोर दिख रहा है।  


एनबीएफसी (गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी) द्वारा जारी किए गए कर्ज में म्यूचुअल फंड का निवेश उनके कर्ज और हाइब्रिड फंड में 3.2 लाख करोड़ रुपये है। क्रेडिट सुसी की पिछले हफ्ते की एक रिपोर्ट के मताबिक इसमें से 1.3 लाख करोड़ रुपये का भुगतान अगले तीन महीने में नियत है। रेटिंग कार्रवाई, बढ़ता दबाव और कमजोर तरलता ने सार्वजनिक बचत को जोखिम में डाल दिया है। सात राज्यों, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और झारखंड ने इन राज्यों के 90 जिलों को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया है। मौसम का अध्ययन करने वाले और जलविज्ञान की परिस्थितियों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का आकलन है कि भारत का 40 फीसदी हिस्सा सूखे से जूझ रहा है। भारत में वास्तविक समय में सूखा अनुमान प्रणाली का प्रबंधन करने वाले आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिक मानते हैं कि भारत का 47 फीसदी हिस्सा सूखे का सामना कर रहा है। चुनाव अभियान का कारवां विश्व जल दिवस से होकर गुजर चुका है।


किसानों की हताशा का जिक्र हुआ है, लेकिन न तो कोई फौरी राहत और न ही दीर्घकालीन समाधान को शोर शराबे से भरे प्रचार अभियान में कोई जगह मिली है। चुनाव का लंबा दौर भी लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाला मुद्दा है। चुनाव आयोग को चुनाव की व्यापकता और उसकी जटिलता के प्रबंधन के लिए दुनियाभर से उचित ही प्रशंसा मिली है। समान रूप से चुनाव आयोग को पूरे देश में शासन को 73 दिनों के लिए ठप कर देने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में 11 अप्रैल को वोट डाले गए थे, लेकिन उन्हें 42 दिनों के बाद ही नई सरकार मिल सकेगी, जब 23 मई को नतीजे आएंगे। हेनरी एडम्स के शब्दों में सवाल करें तो क्या चुनाव अभियान भाषणों से भरा हुआ नहीं है और भाषण खोखली बातों से?

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