वर्षों से गांधी परिवार के प्रशंसक कहते आए हैं कि उनके पास एक ब्रह्मास्त्र है, जिसका नाम है प्रियंका गांधी। इनका यह प्रचार इतना सफल रहा है कि पिछले लोकसभा चुनाव में मुझे याद है कि बनारस के अस्सी घाट पर पप्पू की चाय की दुकान पर जब शहर के बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ शाम को बैठकर चाय पर चर्चा किया करते थे, तब एक ही बात पर उनकी सहमति थी कि नरेंद्र मोदी को वाराणसी में अगर कोई हरा सकता है, तो वह प्रियंका गांधी हैं।
इस बार भी देश भर में इस तरह की चर्चा बहुत हुई है। प्रियंका ने स्वयं इशारा किया कि वह बनारस में कांग्रेस की प्रत्याशी हो सकती हैं। जब वह गंगा जी के रास्ते वाराणसी पहुंचीं और पत्रकारों ने उनको घेरकर पूछा कि अगर वह लोकसभा का चुनाव लड़ेंगी, तो कहां से लड़ना चाहेंगी, तो इस पर प्रियंका ने मुस्कराकर कहा, ‘वाराणसी से क्यों नहीं।’ लेकिन पिछले सप्ताह यह तय हो गया कि प्रियंका इस बार भी नरेंद्र मोदी को उनके चुनाव क्षेत्र में चुनौती देने नहीं आएंगी, बल्कि कांग्रेस का प्रत्याशी कोई और होगा। ऐसा क्यों? क्या गांधी परिवार के समर्थकों को भी अब लगने लग गया है कि शायद यह ब्रह्मास्त्र था ही नहीं?
सच पूछिए तो मैंने जब भी प्रियंका को रायबरेली और अमेठी में अपनी मां और भाई के लिए प्रचार करते हुए देखा है, तो कई बार मुझे लगा है कि सोनिया गांधी को अपने बेटे को नहीं, बल्कि बेटी को अपना वारिस बनाकर राजनीति में लाना चाहिए था। सो प्रियंका जब से सक्रिय राजनीति में आई हैं, मैंने उनके भाषणों, उनकी गतिविधियों और उनके राजनीतिक विचारों पर यह सोचकर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया है कि पता नहीं, कब वह चमत्कार करके दिखाएंगी, कब स्पष्ट करेंगी कि उनके अपने राजनीतिक विचार क्या हैं और सक्रिय राजनीति में वह भारत के लिए क्या करने के लिए आई हैं।
मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि अभी तक उन्होंने ऐसी एक भी बात नहीं कही है, जिससे यह लगे कि उनकी राजनीतिक यात्रा देश के भले के लिए आरंभ हुई है, अपने परिवार को सत्ता में वापस लाने के लिए नहीं।
वह बोलती तो बहुत अच्छा हैं। अपने भाई से कहीं अच्छी हिंदी बोल लेती हैं और ज्यादा आसानी से लोगों से घुल-मिल भी लेती हैं। लेकिन इसके अलावा उनमें कोई गुण नहीं दिखे हैं, जिसको देखकर कोई कह सके कि भारत को वास्तव में एक नया राजनेता मिला है।
प्रियंका के जितने भी भाषण मैंने सुने हैं, उनमें या तो उन्होंने अपनी दादी की तारीफ की है या अपने भाई की। सो हम जान गए हैं कि इंदिरा गांधी को फुटबॉल मैच देखना पसंद था। हमको यह भी जानकारी मिली है कि ‘राहुल जी’ को भी यह खेल बहुत पसंद है और प्रियंका के बेटे को भी। राजनीतिक तौर पर यह जानकारी मिली है कि वह अपने परिवार को सत्ता में इसलिए वापस लाना चाहती हैं, क्योंकि राजनीति में उनके कदम रखने के बाद उन्हें जितने भी लोग मिले हैं, वे सब मोदी के दौर में दुखी रहे हैं, चाहे वे किसान हों या मजदूर, व्यापारी हों या छात्र।
लेकिन इन वर्गों की समस्याओं का समाधान प्रियंका गांधी की नजरों में एक ही है : मेरे परिवार को वापस सत्ता में लाओ, क्योंकि हम ही जानते हैं कि इस देश को कैसे चलाया जाना चाहिए। आपके परिवार के लिए यह अच्छा उपाय होगा प्रियंका जी, लेकिन यह भी तो बता दें कि आपका परिवार अब क्या करके दिखा सकता है, जो लगभग पचास साल के कार्यकाल में नहीं कर सका था।