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यह तो होना ही था

Mon, 19 May 2014 06:37 PM IST
अशोक सण्ड
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बहुत कठिन है राजनीति को पहचानना। और उससे भी कठिन है नेताओं के बयान को समझना। भोले बाबा की नगरी में जन्मी मेरी भोली-भाली पत्नी समझती है कि उसके भोलेनाथ को राजनीति की गहरी समझ है। यह भ्रम बना रहे, तो क्या हर्ज है। चुनाव में तरह-तरह के बयानों का अर्थ समझाते हुए मैं बुरी तरह थक गया।
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एक कहता था, धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को खतरा। दूसरा कहता था, गंगा-जमनी तहजीब को संवारना है। बनारस में सिर्फ गंगा होने के बावजूद मेरी पत्नी की जिज्ञासा थी कि यह गंगा-जमनी तहजीब क्या होती है। बनारस से लगभग एक सौ बीस किलोमीटर दूर इलाहाबाद में प्रवहमान है। संगम भी वहीं है। सरस्वती ‘लुप्त।' पत्नी को कैसे समझाऊं कि गंगा-जमनी तहजीब का ढोल कितना भी पीट लिया जाए, कोई मुसलमान अपनी बेटी का नाम अनुपमा और हिंदू बेनजीर नहीं रखता।

सिर्फ बयान ही नहीं थे हैरान-परेशान करने के लिए। और भी बहुत सारे मुद्दे थे, चीजें थीं। भले प्रचार के शुरुआती दिनों में व्यक्तित्व हावी रहे हों, इस चुनाव के अंतिम दौर में शहर हावी हो गए थे। कभी अमेठी। कभी आजमगढ़ और जाते-जवाते बनारस। रैलियों में उमड़े जन सैलाब को देख लगता था, भीड़ लगाने के लिए कितने लोग कितने खाली हैं। चूंकि कुछ काम नहीं, तो यही काम सही। भीड़ किसके हिस्से की थी। आई थी कि बुलाई गई थी, यह पहचान करना मुश्किल। बस, टोपियों के रंग बदलते रहे। रात में भगवा दिन में सफेद और सूर्यास्त होते-होते लाल।
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भीड़ तो बहुत थी। लेकिन दो ही थे वे लोग, जो चुनाव लड़ रहे थे। एक की अभिलाषा-हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की। दूसरे का विजय घोष-अबकी बार उनकी सरकार। तीसरे को ऑलरेडी ‘मोर्चा’ लग चुका था। अपने सास बहू सीरियल की कुर्बानी पर मेरी भोली बीवी सोच रही थी कि सदाचार का सूरज भ्रष्टाचार के बादल चीरकर बस निकलने ही वाला है। अब गलत खिचड़ी नहीं पकेगी। सुशासन दरवाजा खटखटा रहा है। वही हुआ। खुशहाली आने वाली है। जगह-जगह धुन बज रही है-तेरे द्वार खड़ा एक मोदी।
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