चुनावी नतीजे पर टिप्पणी करते हुए इस अखबार ने देश के राजनीतिक ट्रेंड पर जो टिप्पणी की, वह भारत के राजनीतिक योजनाकारों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। अखबार ने लिखा, 'राजनीतिक रूप से विभाजित देशों में चुनावी नतीजे सिर्फ वैचारिकता, नजरिया, मूल्य या पहचान पर निर्भर नहीं करते। हालांकि चुनावी जीत में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन आखिरी वक्त पर रणनीति ही सबसे निर्णायक साबित होती है। बेहद कठिन, आक्रामक और कर्कश तथा इस्राइल में अब तक के सबसे सुसंगठित चुनावी अभियान में नेतन्याहू सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के प्रमुख के तौर पर शुरू से ही सबसे आगे थे। उनकी ऐसी सक्रियता इससे पहले के चुनावों में नहीं देखी गई। महत्वपूर्ण बात यह भी कि चुनाव अभियान के दौरान वैचारिकताओं का संघर्ष उस तरह नहीं दिखा।' जबकि नेतन्याहू को सर्वाधिक समर्थन धार्मिक जियोनिस्म पार्टी से मिला। चूंकि नेतन्याहू की धुर दक्षिणपंथी पार्टी को पिछले चुनाव की तुलना में संसद में दोगुना सीटें मिली हैं, ऐसे में, विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा मामलों में सत्तारूढ़ लिकुड पार्टी का अब पूरा नियंत्रण होगा।
लिकुड पार्टी पारंपरिक रूप से फलस्तीन तथा इस्राइल के राजनीतिक और सैन्य नियंत्रण में रहने वाले फलस्तीनियों की घनघोर विरोधी है। जाहिर है, यह चुनावी नतीजा फलस्तीनियों के लिए मुसीबत और उसके समर्थक अरब देशों के साथ इस्राइल के संघर्ष की आशंका के साथ आया है। अगर नेतन्याहू की बात करें, तो उनकी यह जीत व्यक्तिगत रूप से उनके लिए बड़ी चुनौती लेकर भी आई है। चुनौती यह है कि प्रधानमंत्री के पिछले कार्यकाल में उन पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे थे, या तो उन्हें इससे मुक्ति पानी होगी या फिर भ्रष्टाचारी की छवि के साथ ही रहना होगा। वर्ष 2019 से अभी तक इस्राइल में जितने भी चुनाव हुए हैं, वे सब नेता के रूप में नेतन्याहू की योग्यता-क्षमता पर मुहर ही हैं। हालांकि उन पर रिश्वत लेने, धोखाधड़ी करने और विश्वासघात करने के आरोप हैं। यह अलग बात है कि लिकुड पार्टी के प्रमुख नेतन्याहू ने इन आरोपों को गलत बताया है।
इस्राइल पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि सत्ता में आने के बाद नेतन्याहू की पार्टी अब धोखाधड़ी और विश्वासघात जैसे अपराधों को, जिसके आरोप में नेतन्याहू पर मुकदमा चल रहा है, दंड संहिता से बाहर करने, इस्राइल के हाई कोर्ट को असांविधानिक कानूनों पर फैसला देने से रोकने और जजों की नियुक्ति पर संसद द्वारा पूरा नियंत्रण रखने जैसे कदम उठाने की योजना बना रही है। नेतन्याहू ने पांच साल में हुए पांचवें चुनाव में निर्णायक विजय हासिल की है, हालांकि इस बीच सत्रह महीने तक उन्हें विपक्ष में रहना पड़ा। बीबी को इस बार के चुनाव में एक ऐसे विपक्ष का सामना करना पड़ा, जिसका नारा था, 'बीबी को छोड़कर कोई भी।' सिर्फ भविष्य ही बताएगा कि वर्ष 2024 में भारत में होने वाले लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी के खिलाफ विपक्ष का चुनावी अभियान कितना सफल होगा।
नेतन्याहू की यह जीत फौरी तौर पर भारत के साथ इस्राइल के रिश्तों को और मजबूती प्रदान करेगी। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत क्वाड का सदस्य तो है ही, भारत आई2यू2 समूह का भी सदस्य है, जिसका शुरुआती नाम इंटरनेशनल फोरम फॉर इंटरनेशनल को-ऑपरेशन था। इस संगठन में भारत के अलावा अमेरिका, इस्राइल और संयुक्त अरब अमीरात हैं। इसकी पहली बैठक विगत जुलाई में ऑनलाइन हुई थी। आई2यू2 के आगामी लक्ष्यों में भारत केंद्रित कुछ योजनाएं भी हैं, जैसे-गुजरात में 33 करोड़ डॉलर की लागत वाली 300 मेगावाट की हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना और देश के विभिन्न हिस्सों में फूड पार्क विकसित करने के लिए दो अरब डॉलर की निवेश योजना।
चूंकि इन दोनों ही समूहों के नेताओं से नरेंद्र मोदी की अच्छी दोस्ती है, लिहाजा भारत को इसका लाभ मिल सकता है। मोदी ने इस्राइल के प्रधानमंत्री का पद छोड़ने वाले लीपिड को तो शुक्रिया कहा ही, उन्होंने फिर प्रधानमंत्री बने नेतन्याहू को भी बधाई दी है। नरेंद्र मोदी इस्राइल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे। हालांकि उनसे पहले तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में इस्राइल की यात्रा की थी। वर्ष 2017 में मोदी द्वारा नेतन्याहू को गले लगाने और समुद्र तट पर साथ-साथ घूमने की तस्वीरों ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया था।
भारत-इस्राइल का द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2000 में 90 करोड़ डॉलर था, जो 2021 में 7.6 अरब डॉलर हो गया। यह स्वाभाविक ही है कि मोदी और नेतन्याहू इस व्यापार को और आगे ले जाएंगे। भारत अपने रक्षा क्षेत्र की जरूरतों का जो हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आयात करता है, उसका 40 फीसदी हिस्सा इस्राइल से आता है। कई इस्राइली फर्म्स भारत में कार्यरत हैं, तो इस्राइल के हाइफा बंदरगाह पर अदाणी समूह का नियंत्रण है। नवंबर, 2021 में भारत और इस्राइल ने दोहरे प्रयोग वाली तकनीक में नवाचार से संबंधित समझौते पर दस्तखत किए थे। उससे पहले दोनों देशों के बीच पांच साल के लिए (2018-23) शोध और विकास परियोजनाओं पर सहयोग करने के लिए एक सहमति पत्र पर दस्तखत हुए थे। जाहिर है, मोदी और नेतन्याहू
भारत-इस्राइल रिश्ते को नई ऊंचाई पर ले जाने की दिशा में काम करेंगे।