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आमंत्रित होकर भी उपेक्षित

Wed, 08 Feb 2017 07:48 PM IST
तस्लीमा नसरीन
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तस्लीमा नसरीन
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सब कुछ की एक हद होती है। पर मुझे निषिद्ध करने की कोई हद नहीं है। देश, राज्य, राजनेता, प्रकाशक, पुस्तक मेला, साहित्य उत्सव-सब मेरे सामने  प्रवेश निषेध की तख्ती टांग देते हैं। मैं दुनिया के एक बड़े हिस्से में अवांछित हूं। लंबे समय तक मैंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ाइयां लड़ीं। लेकिन बार-बार मैं हार जाती हूं।
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जयपुर साहित्य उत्सव दुनिया का सबसे बड़ा साहित्यिक मेला है। इस उत्सव में लगभग पांच लाख लोग हिस्सा लेते हैं। यूरोप-अमेरिका के अनेक दिग्गज लेखक इसमें हिस्सेदारी करते हैं। इस साल इस साहित्य उत्सव में मुझे भी बुलाया गया था। पर मुट्ठी भर कट्टरपंथियों ने मुझे बुलाने पर आपत्ति जताई, तो आयोजकों ने उनके सामने हथियार डालते हुए कहा कि हम आपकी मांग मान लेते हैं, और वायदा करते हैं कि भविष्य में तस्लीमा नसरीन को जयपुर साहित्य उत्सव में  कभी नहीं बुलाएंगे। दुनिया में संभवतः और किसी को इतनी आसानी से प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यह इसलिए भी बार-बार संभव हो पाता है, क्योंकि मैं अकेली हूं।

एक बार आप कट्टरवादियों की मांग मान लेते हैं, तो बार-बार आपको उनकी शर्तें माननी पड़ेंगी। 2012 में सलमान रुश्दी को जयपुर साहित्य उत्सव में बुलाया गया था। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने कहा था कि वे रुश्दी को जयपुर में घुसने नहीं देंगे। आयोजकों ने कट्टरपंथियों की मांग मान ली थी। तय हुआ कि रुश्दी के जयपुर आने की जरूरत नहीं है, साहित्यप्रेमी स्काइप पर ही रुश्दी का वक्तव्य सुन लेंगे। कट्टरपंथियों ने उस पर भी आपत्ति जताई, तो उसे भी रद्द करना पड़ा।
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मुझे इस साल पहली ही बार जयपुर साहित्य उत्सव का निमंत्रण मिला। हालांकि सुरक्षा कारणों से लेखकों की सूची में मेरा नाम नहीं था, सिर्फ मेरी किताब एक्साइल (निर्वासन) का जिक्र था। मेरा कार्यक्रम  सोमवार शाम को पौने चार बजे था। उस दिन मैंने सुबह नाश्ता नहीं किया। सोचा, नहाकर, होटल में ही लंच कर पौने तीन बजे निकल जाऊंगी। मुझे एक दिन पहले ही बता दिया गया था कि मैं हर हाल में तय कार्यक्रम से दो मिनट पहले पहुंच जाऊं। एक दिन पहले ही आयोजकों ने मुझे मंच तक पहुंचाने और वहां से वापस होटल ले जाने के लिए एक गुप्त रास्ते की खोज की थी। लेकिन सोमवार दोपहर बारह बजे अचानक आयोजकों का फोन आया कि शाम पौने चार बजे का मेरा कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है, अगर मैं कार्यक्रम में आना चाहती हूं, तो मुझे आधे घंटे में पहुंचना होगा। नहीं, तो यह कार्यक्रम भी नहीं हो पाएगा, क्योंकि कट्टरवादी मेरे खिलाफ स्थानीय मस्जिद में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

उस समय मेरा स्नान नहीं हुआ था। मुझे भूख भी लग रही थी। इसके बावजूद मैं साड़ी बदलकर जल्दी-जल्दी होटल से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल्य चुकाने निकल पड़ी। कट्टरपंथियों की अन्यायपूर्ण शर्त को चुनौती देने के लिए निकल पड़ी। मंच से भाषण देने का कोई आकर्षण न होने के बावजूद निकल पड़ी। मंच पर पहुंचने के बाद  पता चला कि मेरा समय ही नहीं बदला है, कार्यक्रम की अवधि भी एक घंटा से घटाकर आधा घंटा कर दी गई है। मंच के चारों तरफ पुलिस की भारी उपस्थिति थी। सलिल त्रिपाठी ने मेरे साथ बातचीत की। बातचीत खत्म होते ही सुरक्षाकर्मी मुझे लेकर बाहर निकल पड़े।

जयपुर में मैं चार दिन रुकी। लेकिन साहित्य उत्सव का जरा भी जायजा नहीं ले पाई। होटल में ही बैठी रही। पहले दिन मैं बैठकर दूसरे लेखकों के भाषण सुन रही थी। पर अचानक आयोजकों ने मुझे वहां से हटा दिया, क्योंकि दो लोगों के बीच किसी मुद्दे पर विवाद हो गया था, हालांकि उस विवाद के केंद्र में मैं नहीं थी। मुझे बता भी दिया गया कि मैं साहित्य उत्सव में बेपरवाह कहीं घूम नहीं सकती, क्योंकि सुरक्षा का सवाल है।

जीवन में मैंने अनेक साहित्य उत्सवों में हिस्सेदारी की है, लेकिन खुद को इतना अवांछित कभी महसूस नहीं किया। रात में शानदार आयोजन होने की बात सुनी, लेकिन मुझे किसी ने बुलाया नहीं। एक रात मैं अकेली ही डिनर में पहुंच गई। देखा, वहां लाइव म्यूजिक चल रहा है, खाने-पीने का भरपूर इंतजाम है, हजारों की संख्या में लेखक और पाठक जमा हैं। वहां सिर्फ मैं ही अनामंत्रित थी। सोमवार की रात लेखकों के लिए गाला डिनर का आयोजन था। वहां भी मैं आमंत्रित नहीं थी। वापसी की शाम हवाई अड्डे पर जाकर पता चला कि मेरी फ्लाइट रात बारह बजे है। एयरलाइंस के लोग मुझे देखकर चौंक गए। उन्होंने कहा, आप अभी क्यों आईं? शाम को ही एसएमएस कर दिया था कि फ्लाइट देर से जाएगी। पर मेरा टिकट चूंकि आयोजकों ने खरीदा था, इसलिए संदेश उन्हें मिला था, मुझे नहीं। शायद आयोजक चाहते थे कि लेखकों के साथ गाला डिनर पर बैठने के बजाय एयरपोर्ट पर इंतजार करना ही मेरे लिए अच्छा रहेगा!

पूरे आयोजन के दौरान मैंने महसूस किया कि वहां कोई मेरी उपस्थिति के पक्ष में नहीं था। मैं जानती हूं, स्त्री स्वाधीनता के विरोधियों, कट्टरपंथियों और परंपरावादियों के क्षेत्र में मेरा होना बहुत लोगों को अच्छा नहीं लगता। पर उदारवादियों के इलाके में भी मैं अस्पृश्य हूं। अगले दिन अखबार में मैंने पढ़ा कि दस-बारह कट्टरपंथियों ने, जिन्होंने अपने पूरे जीवन में मेरी कोई किताब नहीं पढ़ी होगी, मेरे खिलाफ नारे लगाए थे। वर्ष 2012 में जयपुर साहित्य उत्सव के आयोजकों ने जिस तरह कट्टरवादियों के सामने समर्पण कर दिया था, उसी तरह 2017 में भी उन्होंने उनके आगे हथियार डाल दिए।  पांच लोगों के सामने पांच लाख लोग हार जाते हैं। क्यों? क्या पांच लोग राक्षस हैं, और पांच लाख लोग भीरू?

मेरी सोच का दायरा जितना बढ़ रहा है, मेरे लिए जगह उतनी ही सिकुड़ती जा रही है। मैं लोगों के बारे में जितना सोचती हूं, उतनी ही अकेली होती जाती हूं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात लोग करते तो खूब हैं, पर इसे अपने जीवन में उतारने वाले लोग बहुत-बहुत कम हैं।
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