भारत के रूस (पूर्व सोवियत संघ) से संबंध एक लंबे अरसे से बहुत मधुर व मजबूत रहे हैं। दोनों देशों की जनता इस पर गर्व करती रही है। लेकिन हाल में कुछ ऐसी चीजें सामने आई हैं, जिनसे संबंधों में दरार पैदा हो जाने की आशंका मजबूत हुई है। आपसी भरोसा भी डगमगाने लगा है। रूस की पाकिस्तान से इन दिनों निकटता बढ़ गई है, जिसे वह अब तक अपना दुश्मन समझता रहा। यह वही पाकिस्तान है, जो अफगानिस्तान में सोवियत दखलंदाजी के समय उसका विरोध कर रहा था। उसे अमेरिका का साथ मिला था।
लेकिन अब इस्लामिक स्टेट (आईएस) को काबू करने के लिए तालिबान की पीठ थपथपाना और उन्हें हथियार और अन्य साजोसामान की पूर्ति करने की खबरें भी सामने आ रही हैं। रूस समझता है कि आईएस की अफगानिस्तान में सक्रियता के कारण मध्य-एशिया और खुद रूस में सुरक्षा संबंधी गंभीर हालात का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए उसका तालिबान व पाकिस्तान के साथ जुड़ाव बहुत जरूरी है।
गौरतलब है कि यह वही तालिबान है, जिसने दस-बारह साल से ज्यादा समय तक सोवियत संघ से टक्कर ली और उसकी फौजों को अफगानिस्तान से खदेड़ दिया था। दिसंबर, 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में अपना लाल परचम लहराया था और अब 37 साल बाद वक्त ने एक नई करवट ली है। गत सितंबर में रूस के सैनिकों ने पाक के सैनिकों के साथ खैबर पख्तुनख्वा प्रांत में संयुक्त सैन्य अभियान भी किया। भारत ने इस पर विरोध जताया था। लेकिन रूस ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह संयुक्त सैन्य अभ्यास आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की मदद करने जैसा है।
इसके अलावा चीन-पाक आर्थिक गलियारे का भी रूस समर्थन करता है। भारत को इस आर्थिक गलियारे पर एतराज है, पर वह भारत को इस परियोजना में शामिल होने की सलाह दे रहा है। दुनिया जानती है कि यह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजर रहा है, जिस पर पाकिस्तान का नाजायज कब्जा है। रूस की पाकिस्तान से बढ़ती निकटता भारत की नाराजगी का सबब है, क्योंकि यह निकटता भारत की पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश के अनुकूल नहीं है।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। अमेरिका का मानना है कि अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ युद्ध में जीत हासिल करने के लिए पाकिस्तान में उसकी पनाहगाहों को नष्ट करना जरूरी है। बीते 27 दिसंबर को ही अफगान सरकार के मशवरे के बिना मास्को में रूस, चीन और पाकिस्तान के अधिकारियों की अफगानिस्तान केंद्रित बैठक पर अफगान सरकार ने चिंता जताई है। इस बैठक में तालिबान को संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधित सूची से निकालने का फैसला लिया गया है, जिसे भारत में चिंता के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल राज्य प्रायोजित आतंकवाद अफगानिस्तान और भारत की सुरक्षा के लिए ही खतरा नहीं, बल्कि ईरान, चीन और मध्य एशियाई देशों के लिए भी गंभीर खतरा है। एक आतंकी संगठन आईएस पर लगाम लगाने के लिए दूसरे आतंकी संगठन तालिबान को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए एक साझा सोच पर आगे बढ़ने की जरूरत है। कल के दुश्मन जो आज दोस्त बन गए, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उम्मीद करनी चाहिए कि रूस वह गलती नहीं दोहराएगा, जो उसने पहले की थी।