फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

हाथी गलियारों में खत्म हो हस्तक्षेप

दीपक कोहली
Updated Sat, 18 Jul 2020 08:13 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
हाथी - फोटो : अमर उजाला
वन एवं वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार हाथियों के झुंड प्रतिवर्ष तकरीबन 350-500 वर्ग किलोमीटर पलायन करते हैं। परंतु तेजी से खंडित होते प्राकृतिक परिदृश्यों ने इस वृहद् आकर वाले स्तनधारी जानवरों को मनुष्यों की रिहायशी बस्ती में प्रवेश करने को मजबूर कर दिया है। यही कारण है कि आए दिन समाचारों में मनुष्य-पशु संघर्ष की खबरें मिल जाती हैं। हाथियों के जीवन को सुरक्षित करने के उद्देश्य से ही हाथी गलियारे का निर्माण किया गया। हाथी गलियारा न केवल हाथियों के लिए बल्कि मनुष्यों की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।


एक अध्ययन 'राइट ऑफ पैसेज' में भारत में अवस्थित 101 हाथी गलियारों की जानकारी प्रदान की गई थी। गौरतलब है कि इन 101 गलियारों में से 28 दक्षिण भारत में हैं, जबकि मध्य भारत में 25, पूर्वोत्तर भारत में 23, उत्तरी पश्चिम बंगाल में 14 और उत्तर-पश्चिमी भारत में 11 हाथी गलियारे हैं। जिस क्षेत्र में अधिक से अधिक जंगलाच्छादित क्षेत्र हैं, वहां उसी केअनुपात में अधिक हाथी गलियारे हैं। यदि मानव बस्तियों के समीप पशु निवास स्थानों को स्थापित किया जाएगा, तो भविष्य में मानव-पशु संघर्ष की घटनाओं में और वृद्धि होना कोई हैरानी की बात नहीं होगी। सबसे ज्यादा हाथी गलियारे प. बंगाल (14) में हैं, उसके बाद तमिलनाडु (13) और उत्तराखंड (11) का स्थान आता है।


वर्ष 2005 और 2017 की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि हाथी गलियारों के क्षरण की स्थिति बेहद गंभीर है। इस अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2017 के 21.8 फीसदी की तुलना में वर्ष 2005 में 22.8 फीसदी गलियारे मानव हस्तक्षेप से मुक्त थे। इसी प्रकार 2017 में 45.5 फीसदी बस्तियां अवस्थित थी, जबकि वर्ष 2005 में मात्र 42 फीसदी बस्तियां ही थीं। वर्ष 2005 के 24 फीसदी की तुलना में वर्ष 2017 में मात्र 12.9 फीसदी गलियारे ही पूरी तरह वनावरण के तहत आते हैं।


मात्र आठ हाथी गलियारों को राज्य के वन विभागों सहित वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय. डब्ल्यू.टी.आई. और अन्य संरक्षण संगठनों द्वारा सुरक्षा प्रदान की गई है। अत: संरक्षण की इस प्रक्रिया को और अधिक विस्तृत किए जाने पर बल देना चाहिए। गौरतलब है कि हाथी गलियारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए 'गज यात्रा' शुरू करने की योजना बनाई जा रही है, जिसमें हाथियों की पहुंच वाले तकरीबन 12 राज्यों में रोड शो के माध्यम से स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित हाथी मॉडलों की परेड की जाएगी। अभी देश के प्रत्येक तीन हाथी गलियारों में से दो कृषि गतिविधियों से प्रभावित हैं। 


उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 36.4 फीसदी, मध्य भारत में 32 फीसदी, उत्तरी पश्चिम बंगाल में 35.7 फीसदी और पूर्वोत्तर में 13 फीसदी हाथी गलियारों के पास से रेलवे लाइनें गुजरती हैं। 11 फीसदी गलियारों के पास से नहरें गुजरती हैं, जबकि 12 फीसदी गलियारे खनन कार्यों से प्रभावित हैं। इसके अलावा, लगभग दो-तिहाई गलियारों के पास से या तो राष्ट्रीय या राज्य राजमार्ग गुजरता है। इससे न केवल हाथियों का निवास स्थान प्रभावित होता, बल्कि उनकी अन्य गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। हाथियों की गतिविधियां बाधित न हों, इसके लिए 20 फीसदी गलियारों में वाहनों के लिए ओवरपास की तत्काल जरूरत है।


वस्तुतः हाथी गलियारों को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में समुदायों को शामिल करना अधिक महत्वपूर्ण है। उस क्षेत्र से लोगों की बेदखली इसका जवाब बिल्कुल नहीं है। गांवों को स्थानांतरित करने के बजाय हमें गलियारे को पुनर्स्थापित करने और लोगों को महत्वपूर्ण हाथी प्रवास वाले मार्गों का उपयोग करने से रोकने की आवश्यकता है। जाहिर है, हाथी गलियारों के संरक्षण एवं रख-रखाव के विषय में शीघ्र ही कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार के साथ-साथ स्थानीय लोगों, संस्थाओं तथा सरकारी एवं निजी संगठनों द्वारा प्रयास किए जाने की जरूरत है, तभी इसका अपेक्षित लाभ मिल सकेगा।

 
और पढ़ें...
विज्ञापन
विज्ञापन
Next