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विश्लेषण: बीमा क्षेत्र को बदल देगा संशोधित विधेयक; आर्थिक विकास को बढ़ावा और बड़े स्तर पर सृजित होगें रोजगार

मधुरेंद्र सिन्हा
Updated Mon, 17 Jul 2023 06:25 AM IST

सार

यह विधेयक 1938 में बने बीमा कानून में संशोधन तो करेगा ही, 1999 के बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण कानून में भी बदलाव लाएगा। इस संशोधन के बाद यह कानून बड़े उद्यमों तथा बीमा कंपनियों के लिए भी फायदेमंद होगा। सरकार का मानना है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि बीमा और स्वास्थ्य सुरक्षा क्षेत्र में बड़ी तादाद में नई कंपनियां उतरेंगी, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होगा।
 
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मानसून सत्र - फोटो : pti


यह विधेयक 1938 में बने बीमा कानून में संशोधन तो करेगा ही, 1999 के बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण कानून में भी बदलाव लाएगा। इस संशोधन के बाद यह कानून बड़े उद्यमों तथा बीमा कंपनियों के लिए भी फायदेमंद होगा। सरकार का मानना है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि बीमा और स्वास्थ्य सुरक्षा क्षेत्र में बड़ी तादाद में नई कंपनियां उतरेंगी, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होगा।


विकसित देशों की तुलना में भारत में बहुत कम लोग व्यक्तिगत बीमा के अंदर आते हैं। लेकिन सरकार के प्रयासों और आर्थिक मदद की वजह से 2021 तक 51 करोड़ से भी ज्यादा लोगों का स्वास्थ्य बीमा हो चुका था। और इस मद में बीमा उद्योग की सकल प्रीमियम आय 470 अरब रुपये थी। भारत वैश्विक स्तर पर दुनिया का नवां बीमा प्रीमियम बाजार है, लेकिन देश की आबादी का महज 3.30 फीसदी ही जीवन बीमा के दायरे में है। इसे ध्यान में रखकर बीमा नियामक आईआरडीएआई ने 2047 तक 'सभी के लिए बीमा' का मिशन शुरू किया है, जिससे बीमा पैठ में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है। इससे कारोबार करने में सुगमता को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी तथा क्षेत्र को अधिक निवेश-अनुकूल बनाने में सहायता मिलेगी। इससे 2027 तक ही भारतीय बीमा बाजार के 200 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। अभी भारत में महज 24 जीवन बीमा कंपनियां हैं और 31 सामान्य बीमा कंपनियां काम कर रही हैं। इस विधेयक के पारित होने के बाद सामान्य कंपनियां भी बीमा के कारोबार में कदम रख सकती हैं।


यह विधेयक इस दृष्टि से अनूठा है कि इसमें बीमा कंपनी खोलने के लिए बाध्यकारी 100 करोड़ रुपये की सीमा को खत्म किया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक कारोबारी इस क्षेत्र में कदम रख सकें। अब भारत में जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा एक साथ हो सकेंगे, जिससे बीमाधारक को बड़ी-बड़ी हेल्थ कंपनियों की सेवाएं बीमा के पैसे से ही मिल सकेंगी। अमेरिका-यूरोप में ऐसी व्यवस्था पहले से है। भारत में सरकार इस क्षेत्र में काम कर रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटाने का काम शुरू कर चुकी है। इससे इस क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए रास्ता खुलेगा।


संसद के मानसून सत्र में इस बार कई और भी विधेयक रखे जाएंगे, जिनमें कंपनियों के दिवालिया होने पर आगे उनके अधिग्रहण को आसान बनाने के लिए भी एक विधेयक है, जिससे समय बर्बाद नहीं होगा और पुरानी कंपनी को कोई नई कंपनी अपने हाथ में ले सकेगी। दरअसल, यह 2016 में बनाए गए इंसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) में संशोधन है, जिससे दीवालियापन की प्रक्रिया में तेजी आए और सबसे उपयुक्त दावेदार को शीघ्र उसकी जिम्मेदारी सौंपी जाए, ताकि संपत्ति बर्बाद न हो। इस बार कर कानूनों में संशोधन से भी जुड़ा विधेयक रखा जाएगा, जिससे टैक्स देने वालों को आसानी होगी और जटिलता खत्म होगी। लेकिन संसद के पिछले सत्र में हमने देखा कि विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस ने इतना हंगामा किया कि दोनों सदनों के कामकाज में बहुत बाधा पहुंची और कई सारे बिल धरे रह गए। कर्नाटक का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के हौसले बुलंद हैं और वह संसद में हंगामे के लिए तैयार है। इसके लिए वह मणिपुर में हुई हिंसा को मुद्दा बनाएगी। इसके अलावा, चूंकि सत्तारूढ़ दल ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) से जुड़े विधेयक को लाने का इरादा जताया है, उस पर भी हंगामा हो सकता है। जाहिर है, इसमें संसद का काफी समय बर्बाद होगा और कई महत्वपूर्ण विधेयक प्रभावित हो सकते हैं।

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