फिर भी, हमारे लिए सुखद यह है कि पाकिस्तान में कुछ लोग भगत सिंह को याद करने की कोशिशों में संलग्न हैं और वे लगातार भगत सिंह के फांसी स्थल, जिसे वहां की सरकार ने शादमान चौक में तब्दील कर दिया है, पर 23 मार्च को एकत्र होकर इस शहीद को याद करने का उपक्रम करते हैं। यह इस दृष्टि से भी प्रशंसनीय है कि जिस देश में अपने जमीनी इतिहास को पूरी तरह विस्मृत कर दिया गया हो, वहां लाहौर की धरती पर लड़े गए स्वाधीनता के एक सेनानी को उसके शहादत स्थल पर याद करना किसी तरह कम जोखिम भरा नहीं है। बावजूद इसके हम चाहते हैं कि भगत सिंह की याद उनकी संपूर्ण वैचारिक चेतना और पक्षधरता के साथ हो, जो सचमुच दुर्लभ और मुश्किल मुहिम है। भगत सिंह कैसा समाज चाहते थे, उनके इंकलाब का अर्थ क्या था, उनके भीतर समाजवाद की समझ कैसी थी, धर्म और सांप्रदायिकता के मुद्दे पर वह किस वैज्ञानिक तर्क से सोचते थे, जहां भाषा भी उनके लिए एक बेहद जरूरी मसला था और उनके समय में देश में छुआछूत की समस्या पर उनका क्रांतिकारी नजरिया हमारे लिए बहुत मायने रखता है। यहां तक कि भगत सिंह अपने चिंतन में नास्तिकता तक पहुंचकर बराबरी पर आधारित वैज्ञानिक समाजवाद की अत्यंत दृढ़ता से वकालत करते हैं।
हालांकि, पाकिस्तान में भगत सिंह पर चलाई जा रही उस मुहिम का कोई अर्थ नहीं है, जिसमें मुकदमे के जरिये यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि सांडर्स-वध में भगत सिंह की हिस्सेदारी नहीं थी और इस घटना की जो प्रथम सूचना रिपोर्ट थाना अनारकली में 17 दिसंबर, 1928 को दर्ज की गई, वह अज्ञात लोगों के विरुद्ध थी, जिसमें भगत सिंह का नाम नहीं है। यह सर्वविदित है कि राजगुरु और भगत सिंह ने चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में अपने कुछ अन्य साथियों के संग सांडर्स पर गोली चलाकर उसका वध किया था। इस टोली की सहायता करने वालों में पीछे भगवान दास माहौर और विजय कुमार सिन्हा भी थे। भगत सिंह ने सांडर्स को मारने से कभी इन्कार नहीं किया और न ही उनके इस अभियान में उनके साथ रहे दल के सहयोगियों का कोई ऐसा कथन है कि भगत सिंह उसमें लिप्त नहीं थे।
ऐसे में, अदालत के माध्यम से अपनी याचिका में इम्तियाज कुरैशी की यह दलील कोई अर्थ नहीं रखती कि भगत सिंह को कोर्ट इस मामले में मुक्त और निर्दोष साबित कर उनकी फांसी की सजा को रद्द करे। ऐसा करने से ब्रिटिश शासन काल में ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ के नाम से लाहौर की अदालत में भगत सिंह और उनके साथियों पर चलाए गए मुकदमे के बहुत से पक्ष लड़खड़ा जाएंगे। फिर, इस तरह कानूनी तौर पर अदालत से भगत सिंह को निरपराध सिद्ध कराने का अर्थ क्या होगा? यहां इम्तियाज कुरैशी को भगत सिंह के जिंदगीनामे और उस इतिहास की वास्तविकता पर भी गौर करना होगा, जिसमें उनके सफरनामे में सांडर्स-वध से लेकर तत्कालीन केंदीय असेंबली कही जाने वाली भारतीय संसद में बम फेंकने से लेकर उस वैचारिक क्रांति का अगुआ बनने का उनका अनोखा कारनामा स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, जो स्वतंत्रता के साथ धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक समाजवाद का मार्ग प्रशस्त करता है।
दरअसल, कुरैशी की ओर से प्रस्तुत ऐसी याचिकाएं चर्चा में आने और बने रहने की कवायद हैं। इतिहास के लिए इनका कोई महत्व नहीं। जरूरत इस बात की है कि भगत सिंह के आदर्शों और सिद्धांतों के आधार पर शोषणविहीन समाज के निर्माण की एक तेज-तर्रार मुहिम इस संपूर्ण उपमहाद्वीप में संचालित की जाए, जो कमोबेश उनकी शहादत के बाद ठहरी प्रतीत होती है।