मेहंदी रंग लाती है सूखने के बाद, स्याही रंग लाती है फेंकने के बाद! स्याही दो प्रकार की होती है- लिखने वाली स्याही और फेंकने वाली स्याही! जो काम न कर पाए कलम वाली स्याही, वह कर दिखाए फेंकने वाली स्याही! यह सच है कि आजकल लिखने वाली स्याही उतना असर नहीं छोड़ पाती, जितना फेंकने वाली स्याही किसी के चेहरे पर फेंकने पर दिखा देती है। चेहरे से ज्यों-ज्यों स्याही को उतारा जाता है, नया रंग उभरता जाता है। नीचे से ऐसे-ऐसे रंग उतर आते हैं, जिसका किसी को अंदेशा तक नहीं होता। राजनीति में ऐसी स्याही का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। यह संघर्ष और सुर्खियों का शॉर्टकट है। फेंकने वाला रातोंरात सुर्खियों में आ जाता है। जिस पर फेंकी गई, वह शक्ल को सहानुभूति मॉड में ले आता है। बद है, बदनाम है, पर नाम तो है।
खैर, फेंकी गई स्याही जूतों से भी ज्यादा असरकारी साबित हो रही है। जूता फेंकने से व्यक्ति इतना चोटिल नहीं होता, निशाना चूकने का भी अंदेशा रहता है। स्याही के एकाध छींटे भी बराबर काम करते हैं। जूते से अक्सर अंदरूनी चोट आती है, जो गुमचोट अब किसी को सालती नहीं। स्याही से चेहरा अजीबोगरीब हो जाता है। यह अजीबोगरीब आजकल ख्वाहिश भी है। जो चीज अजीब है, वही 'तमीज' है। स्याही फेंकने के आगे लिखे हुए हजार पन्ने भी बेकार हैं। लिख-लिखकर बेनकाब करने के लिए टनों कागज काले कर दो। एक पत्ता नहीं हिलता, मक्खी नहीं उड़ती, जूं तक नहीं रेंगती। इसीलिए अब लोगों का कलम वाली स्याही से मोहभंग हो रहा है। स्याही फेंकने से पहले जो साधारण व्यक्ति था, वह अब असाधारण है। ऐसे असाधारण व्यक्ति को स्याही से बदरंग व्यक्ति/पार्टी भी टिकट थमा दे, सहज संभाव्य है। पता नहीं, यह अवमूल्यन स्याही का है, नेताओं का है या कैरेक्टर का। नेता स्याही के लेवल पर आ गए हैं कि स्याही नेताओं के लेवल पर उतर आई है। लेकिन यह तय है कि कभी स्याही कलम में डलकर कमाल करती थी, आज स्प्रे बनकर धमाल करती है।