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जीएम फसलों के जोखिम से कैसे बचेंगे

Tue, 19 Jan 2016 07:29 PM IST
के. सी. त्यागी
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केंद्र सरकार ने जेनेटिकली मॉडीफाइड बीजों यानी जीएम फसलों के प्रयोग की वकालत कर रहे नीति आयोग के टास्क फोर्स की मसौदा रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया है। टास्क फोर्स को संशोधन कर नई रिपोर्ट तैयार करने का आदेश मिला है। सरकार के इस कदम से भारतीय कृषि में विदेशी हस्तक्षेप नहीं चाहने वालों को राहत इसलिए भी मिली है, क्योंकि रिपोर्ट में दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए जीएम बीज का इस्तेमाल, बिजली पर सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और किसानों को उपज के भुगतान के लिए प्राइस डिफिशिएंसी पेमेंट प्रणाली अपनाने की सिफारिश की गई है। पिछले वर्ष मार्च में गठित टास्क फोर्स की अध्यक्षता नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया द्वारा की जा रही है, जो भारतीय कृषि व्यवस्था में जीएम बीजों के माध्यम से उत्पादन में 'अभूतपूर्व वृद्धि' की पुरजोर वकालत करते रहे हैं। जीएम फसलों को भारतीय कृषि व्यवस्था में शामिल किए जाने की कवायद नई नहीं है। इसी बीच ऐसी भी चर्चा सामने आती है कि जीएम बीजों को प्रयोग में लाए जाने से फसलों का उत्पादन बढ़ेगा और देश से भुखमरी की समस्या समाप्त हो जाएगी। थोड़ी देर के लिए उत्पादकता में वृद्धि आंकी जा सकती है, पर इसके दूरगामी परिणाम नुक्सानदेह ही होंगे।
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वैज्ञानिक दृष्टि से जीएम बीज वह बीज होते हैं, जिसे इंजीनियरिंग तकनीक से तैयार किया जाता है। इस तकनीक के अंतर्गत बीजों के स्वजातीय जीनों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया नष्ट कर दूसरी प्रजाति के जीनों को समाहित किया जाता है। इस प्रक्रिया से तैयार बीज अप्राकृतिक हो जाते हैं। बीजों में विद्यमान अप्राकृतिक और रसायनिक गुण स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक ही होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसे अप्राकृतिक प्रक्रिया बता चुका है। वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि जीएम प्रक्रिया के अंतर्गत पौधों में कीटनाशक के गुण समाहित हो जाते हैं। कीटनाशक मौजूद रहने की वजह से फसलों को कीटों से बचाना स्वाभाविक है, परंतु समझने योग्य तथ्य यह है कि पौधों में कीटनाशक के कारण फसलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। अमेरिका में मक्के के जीएम बीज की खेती को स्वीकृति प्रदान किए जाने के बाद सिर्फ एक फीसदी क्षेत्र में जीएम मक्के की खेती को अंजाम दिया गया। सबक लेने योग्य तथ्य है कि महज एक फीसदी क्षेत्र में की गई जीएम मक्के की खेती ने 50 फीसदी गैर जीएम फसल वाले क्षेत्र को संक्रमित कर दिया! इसी तरह दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र चीन ने केवल उत्पादन की चिंता न कर सार्वजनिक भावनाओं का सम्मान किया और जीएम फसलों के प्रसार पर प्रतिबंध लगाया। यूरोपीय संघ के देशों ने भी वैज्ञानिक तथ्यों और सामाजिक अस्वीकृति की वजह से पूर्व में जीएम खेती पर प्रतिबंध लगाने की पहल की है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे उत्पादकता बढ़ाने वाली जादुई छड़ी समझी जा रही है। परंतु वास्तविकता को अपने पर्यावरण और देश के अनुकूल होकर समझे जाने की जरूरत है। बीटी कॉटन खेती की इजाजत से भले ही देश में इसका उत्पादन बढ़ा है, पर इसके दुष्परिणाम भी सामने आ चुके हैं। पंजाब के कपास किसानों की बदहाली इसका जीवंत उदाहरण है। जरूरत है कि मौजूदा कृषि व्यवस्था को दुरूस्त कर हरित क्रांति जैसी पहल दोहराई जाए, न कि कृत्रिम तकनीक को अपनाकर जोखिम मोल लिया जाए।
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लेखक,  जद यू से राज्यसभा के सदस्य हैं 
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