इस विफलता के लिए विपक्षी दलों द्वारा सरकार पर दोष मढ़ते हुए आक्रमण किए जा रहे हैं। देश में विमान संचालन पूर्णतया निजी क्षेत्र में है, ऐसे में सरकार मात्र कानूनी रूप से ही नियंत्रण कर सकती है। विमानन क्षेत्र में निजीकरण गत दस वर्षों में हुआ हो, ऐसा नहीं है। पिछली सरकारों ने इन्हें खुलेआम कानून की अवहेलना करने की छूट दे रखी थी। यदि पहले ही इन्हें कानून मानने के लिए विवश कर दिया जाता, तो आज ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। सरकार पर कर्मचारियों संबंधी दिशा-निर्देश के मूल में भी यात्री सुरक्षा ही है। ऐसे में, यह तय करना होगा कि सुरक्षा महत्वपूर्ण है या एयरलाइन का वाणिज्यिक पक्ष? इस परिप्रेक्ष्य में नगर विमानन के क्षेत्र में सुधारों और यात्री सुरक्षा के मद्देनजर पायलट एवं क्रू सदस्यों के लिए श्रम कानूनों के अनुरूप साप्ताहिक अवकाश व निरंतर रात्रिकालीन पारियों पर रोक अनुचित नहीं ठहरायी जा सकती। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विमान संचालन में रत कर्मचारी मानव नहीं हैं तथा क्या इन कंपनियों पर किसी भी प्रकार की श्रम संहिता लागू नहीं होती? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर में यह तो स्पष्ट है ही कि विमानन कर्मचारी भी मानव हैं तथा उन्हें श्रम संहिता के परिलाभ मिलने भी चाहिए।
कोई भी वाणिज्यिक अथवा गैर-वाणिज्यिक प्रतिष्ठान शुरुआत से ही श्रम कानूनों के दायरे में आ जाता है। ऐसे में, क्या विमानन कंपनी प्रतिष्ठान की श्रेणी में नहीं आती। इस बाबत एक मूलभूत प्रश्न यह भी उठता है कि यदि नगर विमानन मंत्रालय के कर्मचारी संबंधी निर्देश अनुपालना योग्य नहीं थे अथवा पूर्व में पालन नहीं किए जा रहे थे, तो क्या यह प्रत्यक्ष रूप से कर्मचारियों के शोषण की श्रेणी में नहीं आता है? विमानन कर्मचारियों की अन्य कारणों के अतिरिक्त बंद केबिन और ऊंचाई पर चलने के कारण होने वाली व्याधियां अत्यधिक कष्टप्रद हो जाती हंै। अतएव, श्रमिक संगठनों और सामाजिक हितों की पैरोकार बनने वाली स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा साधी गई चुप्पी भी दुखद ही है। पुनः यह स्पष्ट हुआ कि सरोकार का दंभ भरने वाला एक्टिविज्म मात्र अनुदानित प्रकल्पों तक ही सीमित है।
वर्तमान स्थिति का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए, तो उसके लिए एयरलाइन के अलावा किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कर्मचारियों से संबंधित दिशा-निर्देश संचालन अवरोध के लगभग पांच सप्ताह पूर्व समस्त विमानन कंपनियों को अधिसूचित कर दिए गए थे, जो किसी भी रूप में न तो अतिरंजित थे और न ही इनका मकसद किसी कंपनी विशेष को आहत करना था। कंपनियों द्वारा उनका विरोध न किए जाने के कारण सरकार की सकारात्मक धारणा बनना स्वाभाविक था। दिशा-निर्देशों की अवहेलना करते हुए टिकट बुकिंग करना व भ्रम की स्थिति कायम करते हुए यात्रियों को कष्ट पहुंचाना आपराधिक श्रेणी से कम नहीं आंका जा सकता।
उचित तो यह होता कि विमानन कंपनी द्वारा स्व-आकलन कर कर्मचारियों के अभाव के दृष्टिगत संचालन को सीमित कर नई भर्ती स्थगित कर दी जाती, ताकि यात्री असमंजस में न रहते हुए वैकल्पिक व्यवस्था तलाशते। इस संदर्भ में यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि वैश्विक और भारतीय संदर्भ में छुट्टियों, वार-त्योहार तथा शादियों को छोड़कर अधिकतर आरक्षण या टिकट खरीद यात्रा से एक सप्ताह के भीतर की जाती है। अतः, इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता था। दूसरा पक्ष जो इससे भी गंभीर है वह है कंपनी द्वारा खुद को कानून से ऊपर मानते हुए सरकार के अस्तित्व व नियंत्रण पर प्रश्नचिह्न लगाने का अवसर विरोधियों के समक्ष परोस कर रख दिया।
यह प्रकरण मात्र संबंधित एयरलाइन द्वारा उत्पन्न अराजक स्थिति को ही इंगित नहीं करता, बल्कि देश की सबसे बड़ी विमान सेवा के दंभ को भी चकनाचूर कर देता है। हाल ही में, 35 फीसदी तक ही संचालन क्षमता की स्वीकारोक्ति पूर्व में स्थापित क्षमता के दोगुने से भी अधिक संचालन की कलई भी खोलती है। सरकार द्वारा यात्री सुरक्षा को लक्षित कर्मचारियों संबंधी दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन को स्थगित करने का निर्णय अत्यंत दुर्भाग्यशाली है। इससे कानून का उल्लंघन करने वालों के हौसले बुलंद हो जाएंगे। उचित होता कि यात्री सुरक्षा के हित में अवहेलना करने के उत्तरदायी प्रबंधन पर आपराधिक कार्रवाई की जाती, ताकि भविष्य में कोई भी नियम-कानून को हल्के में नहीं लेता।