दरअसल, चीन ने एक ओर तो, अमेरिकी सोयाबीन और दूसरे उत्पादों की अपनी खरीद कम की, तो दूसरी तरफ, उसने अन्य देशों को अपनी बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि की। इसका नतीजा यह हुआ कि कारों से लेकर सौर पैनलों और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स तक, चीनी निर्यात की सुनामी दक्षिण पूर्व एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका में छाती दिख रही है। जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी पारंपरिक विनिर्माण महाशक्तियों में कार निर्माता और अन्य निर्यातक चीनी प्रतिद्वंद्वियों के हाथों ग्राहक खो रहे हैं। इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों के कारखानों को उत्पादन कम या यहां तक कि बंद भी करना पड़ा है, क्योंकि वे चीन की कम कीमतों का मुकाबला करने के लिए जूझ रहे हैं।
यही नहीं, चीनी कंपनियां अपने उत्पादों को अंतिम रूप से तैयार करने के लिए उन्हें दक्षिण पूर्व एशिया, मेक्सिको और अफ्रीका में स्थानांतरित कर देती हैं, जहां से वे तैयार उत्पाद अमेरिका भेजती हैं। इससे उन्हें चीन से सीधे आने वाले माल पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ से आंशिक रूप से बचने में मदद मिली। हालांकि, इस नीति से चीन को तात्कालिक फायदा हुआ है, लेकिन इसमें कई तरह की आशंकाएं छिपी हैं।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों हाल ही में चीन को चेतावनी दे चुके हैं कि अगर उसने व्यापार असंतुलन को कम करने पर ध्यान नहीं दिया, तो यूरोपीय संघ नए टैरिफ लगाने पर मजबूर हो जाएगा। 2024-25 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा भी सौ अरब डॉलर को पार कर चुका है, जो खुद में एक चेतावनी है। आत्मनिर्भर भारत का विजन सही अर्थों में तभी साकार हो सकता है, जब हम अपनी उत्पादन लागत को चीन से कम करें और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएं। कुल मिलाकर, रिकॉर्ड व्यापार अधिशेष चीन के लिए तात्कालिक तौर पर फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नए तरह का आर्थिक युद्ध छिड़ सकता है।