यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने रूस से सैन्य प्लेटफार्म डिलिवरी को काफी प्रभावित किया है। रूस ने पिछले पांच साल में करीब 13 अरब डॉलर के हथियारों की आपूर्ति की है। इससे आगे 10 अरब डॉलर की और आपूर्ति की मांग है। यूक्रेन में चल रहे युद्ध से रूस की स्थिति काफी उलझ गई है। इस बीच, इस्राइली सेना द्वारा गाजा पर आक्रमण जारी है। इससे भारत की हथियारों की आपूर्ति प्रभावित होगी।
ऐसे में, रक्षा स्वदेशीकरण ही आगे बढ़ने का रास्ता है। इसके लिए आधुनिकीकरण की दिशा में भारत के रक्षा खर्च में वृद्धि की जरूरत है। हमारा रक्षा बजट अब रूस के बराबर है। पर अधिकांश राशि वेतन/पेंशन के लिए आवंटित की जाती है। पूंजीगत व्यय के लिए सीमित प्रावधान के साथ वित्त वर्ष 2024 में रक्षा मंत्रालय का बजट 5.94 लाख करोड़ का है। इसमें सैन्य आधुनिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित पूंजी परिव्यय के लिए महज 1.63 लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं। 2008-2012 के बीच रक्षा बजट का पूंजीगत व्यय खर्च औसतन 32 फीसदी रहा, जो 2013-2017 के बीच घटकर 27 प्रतिशत और 2018-2022 के बीच 23 फीसदी रह गया। इस तरह इस दौरान अनुसंधान और विकास कार्य पर खर्च 5.1 फीसदी से गिरकर 4.5 से 4.3 प्रतिशत रह गया।
रक्षा खरीद में बदलाव समय की मांग है। बेशक भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। 2002 से रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में आठ संशोधन हुए हैं। पर अब भी यह प्रक्रिया जटिल ही है। वर्तमान में रक्षा अधिग्रहणों को 12 चरणों की जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें वैश्विक व घरेलू आरएफआई जारी होने और इसके बाद विस्तृत आवश्यकताओं व विशिष्टताओं को परिभाषित करने से लेकर रक्षा मंत्रालय और सुरक्षा पर कैबिनेट समिति की हरी झंडी मिलने तक कई प्रक्रियागत बाधाएं हैं।
आमतौर पर सैन्य अधिग्रहण में एक दशक से अधिक का समय लग सकता है। मसलन, 56 सी-295 मध्यम परिवहन विमान की खरीद मामले को हम देख सकते हैं। इसमें सुधार के लिए, 2015 में मनोहर पर्रिकर द्वारा गठित एक समिति द्वारा एक रक्षा क्षमता अधिग्रहण संगठन का प्रस्ताव रखा गया था। ऐसे संगठन की स्थापना करने का समय अब आ गया है। स्वदेशीकरण को प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए। इस दिशा में हाल ही में रक्षा मंत्री द्वारा जारी सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची में 98 हथियारों के आयात पर प्रतिबंध लगाने का कदम स्वागत योग्य है।
भारत को एक मजबूत मिलिटरी इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स की जरूरत है। देश के निजी क्षेत्र को रक्षा क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। रक्षा मंत्रालय को अपने पिछले अनुभवों से सबक लेना चाहिए। मसलन, मार्च, 2022 में डेफएक्सपो को अचानक स्थगित कर दिया गया। जबकि उसमें करीब एक हजार कंपनियों ने स्टॉल लिए थे और प्रदर्शनी में महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक लागत आई थी। प्रमुख कौशलों को जीवित रखने के लिए भी रक्षा खरीद जरूरी है। सतह से हवा में मार करने वाली आकाश मिसाइल प्रणाली के विकास को ही लें। इसे 2008 में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से विकसित किया गया था और इसमें रक्षा मंत्रालय द्वारा 3,000 विक्रेताओं को 11,800 भागों की आपूर्ति के लिए प्रमाणित किया गया था। बार-बार यह प्रवृत्ति दोहराई जाती है।
तेजस को अपनी पहली उड़ान के 19 साल बाद पहला ऑर्डर मिला। भारत के निजी क्षेत्र को रक्षा विनिर्माण में गुणवत्ता संबंधी मुद्दों को हल करने के लिए आगे आना चाहिए। कम प्रौद्योगिकी वाले रक्षा उत्पाद तकनीकी गड़बड़ियों, घटकों की विफलता और सौदे के बाद ग्राहकों को सीमित परिचालन/सेवा सहायता के कारण बाधित हो रहे हैं। दुर्घटनाओं के कारण भी काफी नुकसान हुआ है। वर्ष 2009 में इक्वाडोर को बेचे गए सात एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टरों में से चार अलग-अलग वजहों से अनुबंध रद्द हो गया। इससे हमारी विश्वसनीयता को भी ठेस लगी। एडवांस्ड लाइट हेलिकॉप्टर (एएलएच) तकनीकी गड़बड़ियों और आपातकालीन लैंडिंग से परेशान हैं। इससे संभावित उपयोगकर्ताओं के मन में अनिश्चितता पैदा हो रही है।
अधिक निर्यात से गुणवत्ता सुधार में मदद मिल सकती है। रक्षा उत्पादन व निर्यात संवर्धन नीति, 2020 में वर्ष 2025 तक 25 अरब डॉलर का रक्षा उद्योग होने की बात कही गई है। इससे सालाना पांच अरब डॉलर के निर्यात का आकलन किया गया। दरअसल भारत हथियारों के निर्यात की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गया है। सार्वजनिक क्षेत्र के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वैसे केलकर समिति (2005) की सिफारिशों से रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
रक्षा निर्यात में वृद्धि के लिहाज से फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की बैटरियों की हालिया बिक्री एक आशाजनक संकेत हो सकती है। इस क्रम में अपने निजी क्षेत्र को राजनयिक प्रयासों और सब्सिडी के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों का पता लगाने और खरीदारों के साथ साझेदारी विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत होगी। भारत ज्यों-ज्यों अगले दशक में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर होगा, उसे एक मजबूत डिफेंस-इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स की आवश्यकता होगी, जो बड़े पैमाने पर और अपेक्षित गुणवत्ता पर रक्षा आवश्यकताएं पूरी करने में सक्षम हो।