पूर्व सैनिकों की निजी क्षेत्र में तो मांग है, लेकिन सरकारी क्षेत्र में उनकी प्राथमिकता/आरक्षण का कोटा भी नहीं भरा जाता। क्या विरोधाभास है, कि 50 से 60 हजार सैनिक प्रतिवर्ष रिटायर हो रहे हैं, लेकिन राज्यों में उनके आरक्षित पद सरेंडर हो रहे हैं। सूचनाएं भी नहीं उपलब्ध हैं कि किस विभाग में कितने पूर्व सैनिकों की नियुक्तियां हो सकी हैं और कितने पद रिक्त हैं। पूर्व सैनिकों के हित की दृष्टि से अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद एक सक्षम संगठन है, जिसके बारे में पिछले वर्ष रक्षामंत्री ने भी कहा था कि अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद रक्षा मंत्रालय द्वारा स्वीकृत संस्थान है। इससे पूर्व सैनिकों के प्रति पुलिस-प्रशासनिक दुर्व्यवहार में कमी आई है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री ने पूर्व सैनिकों की शिकायतों के समाधान के लिए एक पोर्टल लांच किया है। आरक्षण का अनुपालन होना प्रारंभ हुआ है।
पूर्व सैनिक निदेशालय तो बहुत से राज्यों में हैं। जनपदों में सैनिक कल्याण अधिकारी भी हैं, पर उनका ध्यान अधिकांशतः शासकीय नीतियों-योजनाओं के अनुपालन पर ही रहता है। फलतः पूर्व सैनिकों के हित प्रायः नजर अंदाज हो जाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि यह व्यवस्था दी जाए कि जो पूर्व सैनिक अपने गांव या कस्बे में क्लास आठ तक के स्कूल संचालित करना चाहते हैं, उन्हें ग्रामसभा की भूमि या वित्तीय व्यय का एक अंश दिया जाएगा, तो बहुत से पूर्व सैनिक सामने आएंगे। इससे उनकी क्षमता व योग्यता का उपयोग देश के भविष्य को संवारने में हो सकता है।
अब ऐसे प्रस्तावों पर विचार करने व शासन के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए एक विभाग या मंत्रालय की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में पूर्व सैनिक कल्याण मंत्री तो हैं, लेकिन उनका अलग से कोई विभाग नहीं है। ऐसी समस्या बहुत से राज्यों में होगी। दूसरी समस्या पूर्व सैनिकों की सामाजिक भागीदारी के प्रोत्साहन की है। अपने परिवेश, मुहल्लों, सोसायटी में पूर्व सैनिकों की सक्रियता दिखती है। बहुत-सी नगरीय समस्याओं के प्रति वे जनहित में प्रभावी योगदान दे सकते हैं, लेकिन शासकीय सहयोग से उन्हें अवसर दिया जाए, तभी तो परिवर्तन आएगा। वार्डों, नगर निकायों में पूर्व सैनिक विकास संबंधी दायित्वों का सफल संचालन कर सकते हैं। यदि राष्ट्रवादी दल निकायों के स्थानीय प्रकृति के इन गैर-राजनैतिक चुनावों में पूर्व सैनिकों को दो प्रतिशत प्रतिनिधित्व का भी अवसर दे सकें, तो विकास कार्यों में जनहित सरोकारों का एक नया मानदंड बनेगा व दायित्वबोध का नया पक्ष सामने आएगा। यह मौका निर्वाचन में सहयोग से या चुनाव बाद बतौर पार्षद नामित किए जाने से भी हो सकता है।
देश में बहुत से स्थानीय निकाय हैं, छह लाख तो ग्रामसभाएं ही हैं। उत्तर प्रदेश में ही सात सौ से अधिक नगरीय निकाय व 50 हजार से अधिक ग्रामसभाएं हैं। नगरीय निकायों के चुनाव होने वाले हैं। राष्ट्रविरोधी राजनीति से तो कोई आशा नहीं करनी चाहिए, लेकिन जो राष्ट्रवादी दल हैं, उनसे पूर्व सैनिकों को बहुत अपेक्षाएं हैं। अभी चार वर्षों के बाद ही अग्निवीर सैनिक भी सेवामुक्त होकर आने लगेंगे। राष्ट्र विरोधी तत्व उन्हें बरगलाने का पूर्ण प्रयास करेंगे, हमें उनके लिए भी सिविल विभागों, बलों में भूमिका की तलाश करनी है। यदि मौजूदा पूर्व सैनिक नागरिक सेवा के विभिन्न दायित्वों में आ गए, तो बाद में रिटायर होने वाले अग्निवीरों के लिए भी स्वतः मार्ग बनता जाएगा।