आम धारणा यही होती है कि सरकार बदलने पर विदेश नीति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होता है। हां, नए नेता की शैली और तात्कालिक परिस्थितियों का थोड़ा फर्क पड़ता है। इस मायने में देखें, तो सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार यूपीए की दस साल की नीतियों की जरूर समीक्षा करना चाहेगी। नरेंद्र मोदी की अहम कोशिश भारत को एशियाई देशों में एक धुरी के रूप में स्थापित करने की होनी चाहिए। देश में विकास को एजेंडा बनाकर चुनाव में उतरी भाजपा विश्व राजनीति के संदर्भ में भी इस बात को अहमियत देती दिखेगी।
भारत की विदेश नीति में सबसे अहम पहलू अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को सहज करना रहा है। अगर हमारे पड़ोस में अशांति हो, तो उसका असर भारत पर किसी न किसी तरह पड़ता है। श्रीलंका की ओर देखें, तो जरूरी है कि इस देश का आत्मसम्मान बना रहे। समुद्री इलाकों में दोनों देशों के मछुआरों के अपने अधिकारों के चलते तनाव हो जाता है। भारत की पहल यही होगी कि श्रीलंका के अंदरूनी मामलों में कोई तीसरा देश किसी तरह हस्तक्षेप न करे। बेशक, भारत ने किसी दबाव में सुरक्षा परिषद में श्रीलंका का साथ नहीं दिया था, लेकिन इसे चुनाव से पहले की प्रक्रिया मानना चाहिए। आगे भारत की नीति यही होनी चाहिए कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियों को बढ़ने न दे। श्रीलंका के साथ अच्छे संबंधों के लिए ठोस और सार्थक बातचीत के साथ-साथ बंदरगाहों पर नियमित देखरेख, व्यापार और बुनियादी संसाधनों को बढ़ाने जैसे कामों में दिलचस्पी दिखाना जरूरी है। भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के बीच परस्पर अच्छा संवाद बना है। जटिल स्थितियों में ऐसे आपसी रिश्तों का अहम महत्व होता है।
पाकिस्तान को अभी कुछ समय के लिए छोड़ देना चाहिए। अभी वहां किसी तरह की पहल की गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान में देखना होगा कि वहां सेना की क्या भूमिका होती है। पाकिस्तान के तीन मित्र देश-चीन, सऊदी अरब और अमेरिका कहीं न कहीं उसे अपने ढंग से प्रभावित करते हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी होगा कि भारत पाकिस्तान के करीबी देशों से बातचीत का रास्ता अपनाता रहे और आपस में भी हर स्तर पर संवाद की गुंजाइश रखे। आपसी संबंधों का जो सूत्र वाजपेयी सरकार ने अपनाया था, मोदी सरकार उस पर चलेगी। पर मानना चाहिए कि यह चौकस सरकार होगी।
अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो फौज की वापसी के बाद भारत के लिए यह अहम होगा कि वह ध्यान रखे कि वहां विकास और बुनियादी संरचनाओं पर किस तरह काम किया जा रहा है। इस मुल्क ने पिछले दो दशकों में केवल बर्बादी ही देखी है। भारत की पहल उसे फिर से खड़ा करने की होनी चाहिए। यह किसी भी तौर पर ठीक नहीं होगा कि यह मुल्क पाकिस्तान के हाथों खेल जाए।
अलबत्ता नेपाल के मामले में हमें काफी सजग रहना होगा। वहां सरकार ढंग से नहीं चल पाई है। लोकतंत्र की जड़ें नहीं जम रही हैं। भारत को नेपाल को आगे तो बढ़ाना है, लेकिन कुछ स्पष्ट संकेत भी देने होंगे। यह जानना चाहिए कि जब तक नेपाल असुरक्षित है, भारत भी सुरक्षित नहीं है।
चीन एक बड़ा देश है और उसी के अनुरूप अपनी भूमिका चाहता है। भारत की नई सरकार को चीन को यह संदेश देना होगा कि केवल पड़ोसी देशों को धमकाकर वह अपनी यह भूमिका तय नहीं कर सकता। चीन अपने आधिपत्य की नीति में जापान से भी बहस करता है। हिंद महासागर में वह सीमा के अतिक्रमण तक उतर जाता है। कभी चीन में नदियों की दिशा बदलने की बात होती है, कभी वह भारत की सीमा में अपनी चौकियां स्थापित कर लेता है। ऐसी स्थितियों में मोदी सरकार से तीखे एतराज जताने की अपेक्षा रहेगी। मोदी ने जिस व्यक्तित्व का परिचय दिया है, उसमें इतना लगता है कि नई सरकार मूक होकर नहीं रहेगी।
मालदीव फिलीपींस, मलयेशिया, यमन जैसे तमाम छोटे देशों के साथ सहयोग की नीति तो अपनाई जानी चाहिए, लेकिन नई सरकार को ध्यान रखना होगा कि इन मुल्कों में किसी तरह की चौधराहट की प्रतिध्वनि न सुनाई दे। बल्कि नई सरकार इन देशों से जुड़ने के लिए अपनी आर्थिक नीतियों को सुलभ बनाने की कोशिश कर सकती है। इन्हें अपनी ओर खींच सकती है। यह हो सकता है कि नरेंद्र मोदी अपनी पहल से इन राष्ट्रों का एक मंच तैयार करें। वह यह काम बखूबी कर सकते हैं। ऊंची उड़ान और अपने अस्तित्व के लिए जापान, थाईलैंड, हांगकांग, सिंगापुर जैसे राष्ट्रों की एक नई प्रतिध्वनि सुनाई दे सकती है। भारत में मोदी का नेतृत्व इस अभियान का नेतृत्व बखूबी कर सकता है।
इस संदर्भ में कहना होगा कि भारत के नए प्रधानमंत्री, हो सकता है, सबसे पहले जापान की यात्रा पर निकलें। यह एक संदेश होगा कि भारत बिना किसी दबाव के इस क्षेत्र में आर्थिक विकास की संभावना देख रहा है। दूसरा, यह चीन और अमेरिका को अप्रत्यक्ष संदेश होगा कि संबंधों की एक नई धुरी में कई एशियाई देश खुद को संगठित और विकसित करने का आयाम तलाश रहे हैं।
नई परिस्थितियों में भारत में केंद्र में सत्ता में आने वाली सरकार को यह जरूर सोचना होगा कि राज्यों की भूमिका को पूरा महत्व दिया जाए। विदेश नीति केवल केंद्र का विषय नहीं है। श्रीलंका के मसले पर तमिलनाडु, पाकिस्तान के मसले पर पंजाब और कश्मीर, नेपाल के संदर्भ में उत्तर प्रदेश और बांग्लादेश के संदर्भ में असम, पश्चिम बंगाल की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विकास और सुरक्षा के मामले में क्षेत्रीय शक्तियों की अनदेखी नहीं की जा सकती।