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आंतरिक विरोधाभासों से घिरे यूनुस: चीन की गोद में बैठने को आतुर नेता भारत-विरोधी..; अब चुनाव और सुधारों की मांग

महेंद्र वेद
Updated Mon, 26 May 2025 06:13 AM IST

सार

एक ओर बीएनपी जल्द चुनाव चाहती है, तो दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के साथ मिली छात्रों की बांग्लादेश सिटिजंस पार्टी चुनाव से पहले सुधार चाहती है। चीन की गोद में बैठने को आतुर भारत-विरोधी बने मो. यूनुस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव जमाने की होड़ में आंतरिक विरोधाभासों को संभाल नहीं पा रहे।
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बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल) - फोटो : ANI


नोबेलजयी अर्थशास्त्री 84 वर्षीय यूनुस, जिनके पास कोई राजनीतिक समर्थन नहीं है, ने अपने मंत्रियों से शिकायत की कि 'जब उन्होंने पदभार संभाला था, तब जो वादे किए गए थे, उन्हें तोड़ा जा रहा है।' न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, लेकिन उन्होंने विस्तार से नहीं बताया कि वे ‘वादे’ क्या थे, उन्हें कैसे ‘तोड़ा’ गया और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। दैनिक अखबार ढाका ट्रिब्यून ने यूनुस के कार्यालय के सूत्र के हवाले से कहा, 'मुख्य सलाहकार हाल ही में विभिन्न मुद्दों पर लगातार आंदोलन के कारण कुछ हद तक शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। अगर वह स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकते, तो वह पद पर नहीं रहना चाहते।' यूनुस ने अपने सबसे करीबी सहयोगियों में से एक नाहिद इस्लाम से कहा कि उन्हें 'स्थिति का बंधक बना लिया गया है।' यूनुस की घोषणा के बाद उनके पक्ष और विपक्ष में राजनीतिक रैलियां शुरू हो गई हैं। जुम्मे की नमाज के बाद पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने ढाका में एक विशाल रैली की। बीएनपी जल्द चुनाव कराने की मांग कर रही है, क्योंकि अब उसकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी, अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और कोई भी गतिवधि करने से रोक दिया गया है। हालांकि, इस्लामवादी छात्रों की बांग्लादेश सिटिजंस पार्टी, जो जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर काम कर रही है, ने यूनुस के पक्ष में एक रैली की और उनसे पद पर बने रहने का आग्रह किया। यह समूह चुनाव से पहले ‘सुधारों’ पर जोर देता है। इस्लामवादी भी समय ले रहे हैं।


विश्लेषकों का कहना है कि वे चुनाव में सीधे जीत नहीं सकते, भले ही अवामी लीग मैदान से बाहर हो, और वे नहीं चाहेंगे कि सत्ता जिया की पार्टी के पास जाए, जो उनकी सहयोगी है और जिसने 2001-2006 के दौरान सत्ता साझा की थी। वे बीएनपी को स्वीकार नहीं करते। गौरतलब है कि पश्चिमी सरकारें और मीडिया ‘इस्लामवादी’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करते। उन्होंने शेख हसीना के निरंकुश शासन में बदलाव का स्वागत किया। उन्हें उम्मीद है कि यूनुस एक ऐसे लोकतंत्र की शुरुआत करने में मदद करेंगे, जिसे वे स्वीकार कर सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि जब अगस्त, 2024 में बांग्लादेश में कुछ घटनाएं घटीं, तब यूनुस अमेरिका के दो पूर्व राष्ट्रपतियों बिल क्लिंटन और बराक ओबामा के साथ बैठक में मौजूद थे। उन्हें सबसे बेहतर उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन उनके शासन के नौ महीनों में देश में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट, कानून-व्यवस्था की कमी और धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार देखने को मिले हैं। हालांकि, पिछले साल के सत्ता परिवर्तन ने बड़े भू-राजनीतिक बदलावों की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। इस्लामवादियों के उभार ने भारत को परेशान कर दिया है, जो इसे अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। भारत को अपना 'शत्रु' मानने वाले शासन का नेतृत्व करते हुए यूनुस ने चीन और अन्य देशों से यह कहकर भारत के घाव पर नमक छिड़कने का काम किया कि भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र 'भूमि से घिरा हुआ' है और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच के लिए वे बांग्लादेश पर भरोसा कर सकते हैं। इसने भारत को बांग्लादेश के निर्यात तक अपनी पहुंच सीमित करने के लिए प्रेरित किया है, जबकि वह खुद को क्षेत्र के छोटे देशों द्वारा चीन, अमेरिका या दोनों से घनिष्ठ संबंध बनाने के कारण घिरा हुआ पाता है। 


'राइजिंग नॉर्थ ईस्ट इन्वेस्टर्स समिट' को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस धारणा को खारिज किया कि भूगोल पूर्वोत्तर के विकास में बाधक हो सकता है। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर देश के एक्ट ईस्ट पॉलिसी के केंद्र में है और यह आसियान व्यापार का द्वार तथा मजबूत पुल बनेगा। इसके अलावा, इस क्षेत्र में गहरे भू-रणनीतिक बदलावों की भी कोशिशें हो रही हैं। उनमें से एक है 'मानवीय गलियारा' बनाना, जिसे यूनुस शासन द्वारा सुगम बनाया जा रहा है, और कथित तौर पर ट्रंप का भी समर्थन प्राप्त है। बांग्लादेश-म्यांमार सीमा पर 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर और संभवतः हथियार भेजे गए हैं। यह 'गलियारा' म्यांमार के रखाइन प्रांत से होकर गुजरता है, जिस पर रखाइन सेना का नियंत्रण है, जो विद्रोहियों की सेना है और म्यांमार के चीन समर्थित सैन्य जुंटा से लड़ रहा है। बांग्लादेश को उम्मीद है कि वह इस गलियारे के जरिये रोहिंग्या शरणार्थियों को भेज सकेगा। 'गलियारा' कलादान नदी के जरिये सित्तवे बंदरगाह तक जाने वाली 22,000 करोड़ रुपये की परियोजना को प्रभावित कर सकता है। कुल मिलाकर, भारत को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में एक नई अमेरिकी-चीन प्रतिद्वंद्विता के उदय पर ध्यान देना होगा। हालांकि बांग्लादेश की सेना इस गलियारे का विरोध करती है, जिसका कहना है कि उससे परामर्श नहीं किया जा रहा है। 


यूनुस शासन ने बहुत तेजी से कई मोर्चों पर काम किया है, लेकिन विदेश में लाभ और प्रभाव जमाने की होड़ में वह आंतरिक विरोधाभासों को संभाल नहीं सके। न तो अमेरिकी समर्थन से कोई मदद मिली और न ही, अब तक 2.3 अरब डॉलर के आईएमएफ ऋण की त्वरित मंजूरी मिली है। यूनुस और उनके सलाहकार एक महत्वपूर्ण बात को समझने में विफल रहे कि चुनाव बांग्लादेश की गतिशीलता का अभिन्न अंग हैं, चाहे कोई उन्हें चाहे या न चाहे और चाहे उनसे एक स्थिर सरकार मिले या न मिले।

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