पिछले हफ्ते विदेश यात्रा के दौरान इंटरनेशनल डेबिट या क्रेडिट कार्ड से लेन-देन पर लिबरलाइज्ड रेमिटेन्स स्कीम (एलआरएस) की ढाई लाख रुपये की सीमा के तहत उच्च कर थोपने को लेकर आक्रोश था। पहले इस पर पांच प्रतिशत कर लगाने का प्रावधान था, लेकिन जुलाई, 2023 से प्रभावी नई व्यवस्था के तहत 20 फीसदी कर लगाया जाएगा। सरकार ने विदेशी मुद्रा लेन-देन के लिए सात लाख रुपये की सीमा को भी समाप्त कर दिया है। इस कर को स्रोत पर एकत्रित कर (टीसीएस) के रूप में वर्गीकृत किया जाता था, इसके लिए अनिवार्य रूप से करदाता को जिम्मेदार माना जाता है, जब तक कि कुछ और सिद्ध न हो।
यह सच है कि वार्षिक कर देनदारी के बरक्स वर्ष के अंत में क्षतिपूर्ति के नियम दिए गए हैं। यह भी उतना ही सच है कि इसका अनुपालन कठिन होगा, जिसमें कई चरण और दस्तावेज शामिल होंगे। एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक की मुश्किल की कल्पना कीजिए, जिसे रिटर्न भरने की जरूरत नहीं है और यदि वह पोते-पोतियों से मिलने के लिए विदेश यात्रा करे या उस असहाय नागरिक के बारे में विचार करें, जो रिटर्न भरने तथा रिफंड का दावा करने के लिए बैंक, कार्ड कंपनी, सीए और आईटी विभाग के चक्कर लगा रहा है।
तथ्य यह है कि लोग अपनी वह बचत खर्च करते हैं, जिस पर वे कर चुकाते हैं। इसलिए प्रभावी रूप से नया नियम मेहनत से अर्जित की गई बचत पर 20 प्रतिशत का उपभोग कर लगाएगा। चार्टेड अकाउंटेंट और स्टार्ट अप निवेशक मोहनदास पई ने कहा, 'लोगों को केवल रिफंड का दावा करने के लिए भुगतान क्यों करना चाहिए? व्यापार सुगमता और ईमानदार करदाता के हित में 20 फीसदी टीसीएस को वापस लेना चाहिए। यदि जरूरी ही हो, तो दो फीसदी कर लगाना चाहिए। हम बेईमान नहीं हैं!'
इसमें बदलाव को लेकर जो आक्रोश था, उस पर सरकार ने एक स्पष्टीकरण जारी किया, 'एक जुलाई, 2023 से एलआरएस के तहत छोटे लेन-देन के लिए टीसीएस के औचित्य को लेकर चिंता जताई गई है। किसी भी अस्पष्टता से बचने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने अंतरराष्ट्रीय डेबिट या क्रेडिट कार्ड का उपयोग करके प्रति वित्तीय वर्ष सात लाख रुपये तक के भुगतान को एलआरएस सीमा से बाहर रखा जाएगा और इसके लिए कोई टीसीएस नहीं लगेगा।'
नीति की मंशा को लेकर स्पष्टता और सूचना की कमी के कारण मध्यवर्ग की परेशानियां अक्सर बदतर हो जाती हैं। जरा तथ्यों पर विचार कीजिए। भारत 37 खरब डॉलर से अधिक की जीडीपी के साथ सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। ऐसा नहीं हो सकता कि मजबूत राजस्व संग्रह को देखते हुए इसका उद्देश्य अपने खजाने के लिए ब्याज मुक्त नकदी प्रवाह एकत्र करना होगा। यह विदेशी मुद्रा की कमी के कारण भी नहीं हो सकता है। इस हफ्ते रिजर्व बैंक ने बताया कि विदेशी मुद्रा भंडार में 599.53 अरब डॉलर है, और चालू खाता बचत में भी सुधार हुआ है।
जीवन सुगमता और व्यवसाय सुगमता के घोषित उद्देश्य और इच्छित परिणाम के लिए अपनाए जाने वाले तरीके के बीच का विरोधाभास हैरान करने वाला है। मौजूदा शासन स्वरोजगार को बढ़ावा दे रहा है और यह घोषणा करने में गर्व महसूस करता है कि भारत रोजगार सृजकों की अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। फिर भी यह उन पेशेवरों पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाने पर कायम है, जिनके पास खर्चों पर भुगतान किए गए जीएसटी की भरपाई करने का अवसर नहीं है। वास्तव में भुगतान किए गए सभी करों के योग- जीएसटी को आयकर के साथ जोड़ दें- से आय पर कर के सही स्तर का पता चलता है।
पिछले शुक्रवार को जब रिजर्व बैंक ने 2,000 रुपये के नोट की चरणबद्ध तरीके से वापसी की घोषणा की, तो सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूह में भी लोगों ने इसका जश्न मनाया। यह कोई रहस्य नहीं है कि आपात स्थिति के लिए हर परिवार घर पर एक-दो लाख रुपये नकदी रखता है। घरों में महिलाएं भी विवाह या बच्चों के लिए बचत करती हैं। इस मामले में सबसे बुरी बात है कि कुछ बैंकों ने घोषणापत्र और पहचान सत्यापन के लिए प्रपत्र मुद्रित किए। शुक्र है कि बेहतर समझ बनी और उम्मीद है कि नोटबंदी के दौरान देखे गए दिनों की पुनरावृत्ति नहीं होगी। लोकप्रिय धारणाएं बताती हैं कि इससे चुनाव पूर्व नकदी की जमाखोरी करने वाले राजनेता फंस जाएंगे। जबकि इतिहास बताता है कि नोटबंदी के बाद 15.41 लाख करोड़ रुपये में से 99.3 प्रतिशत से अधिक को सफलतापूर्वक परिवर्तित कर दिया गया था। दरअसल भ्रष्टाचार राजनीतिक फंडिंग की अपारदर्शी व्यवस्था में शरण लिए हुए है।
मध्यवर्ग राहत की सांस ले सकता है, लेकिन यह अल्पकालिक होगा। रिपोर्टों से पता चलता है कि सरकार अपने कर आधार को बढ़ाने के लिए विदेश यात्रा करने वाले, ज्यादा बिजली बिल भरने वाले, फर्टिलिटी क्लिनिक की सेवा लेने वाले जैसे बड़े खर्च करने वालों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में मतदाताओं की ताकत का पता चलता है, जिनमें सबसे निचले आय वर्ग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। और यह मध्यवर्ग ही है, जो कम से कम सरकार के खर्च का कुछ हिस्सा चुका रहा है। उदाहरण के लिए, कांग्रेस द्वारा जारी दो करोड़ गारंटी कार्डों की पूर्ति के लिए कर्नाटक पर 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक लागत आने का अनुमान है। ऐसी ही योजनाओं की घोषणा अन्य राज्यों द्वारा की जा रही हैं। स्वास्थ्य एवं शिक्षा के बदले मुफ्त रेवड़ियां बांटी जाती हैं। मध्यवर्ग को यह सवाल पूछना चाहिए कि किसकी कीमत पर किसको फायदा हो रहा है!
अपरिहार्य रूप से मध्यवर्ग आय पिरामिड के शीर्ष पर रहने वाले लोगों और निचले पायदान पर मुफ्त चाहने वालों के बीच फंसा हुआ है। जब तक वे बोलेंगे नहीं, उनकी स्थिति ऐसी ही बनी रहने वाली है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने नाटक पैग्मेलियन में मध्यवर्ग के भाग्य का स्पष्ट वर्णन किया था- 'मुझे दूसरों के लिए जीना है, अपने लिए नहीं : यह मध्यवर्ग की नैतिकता है।'