संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पर हुई बहस मैंने बहुत ध्यान से सुनी। दोनों सदनों में हुई बहस सुनने के बाद जब मैं विश्लेषण करने बैठी, तो याद आया कि इस बहस के दौरान सबसे ज्यादा तकलीफ मुझे तब हुई, जब पाकिस्तान-भारत की तुलना वक्ताओं ने बार-बार की। गृह मंत्री ने कहा कि पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों का हाल इतना बुरा रहा है कि आज तक वहां से लोग भागकर भारत में शरण लेने आ रहे हैं, जबकि अपने देश में स्थिति बिल्कुल अलग रही है। उन्होंने कहा, यहां मुसलमान सत्ता की ऊंचाइयों तक पहुंच पाए हैं–राष्ट्रपति बने हैं, मंत्री बने हैं और मुख्य न्यायाधीश भी। ये बातें अन्य वक्ताओं ने भी संसद में कही। टीवी चर्चाओं में कई पत्रकारों ने ध्यान दिलाया कि भारत में 1947 के बाद मुसलमानों की आबादी दोगुनी हो गई है, जबकि बंटवारे के समय पाकिस्तान में 20 फीसदी से ज्यादा हिंदू थे, लेकिन अब उनकी संख्या शायद दो फीसदी ही रह गई है।
इन बातों को सुनकर मुझे ऐसा लगा कि ये लोग देशभक्ति के नाम पर भारत को बदनाम कर रहे हैं। भारत न कभी पाकिस्तान था और न कभी बन सकता है। जिन मुट्ठी भर हिंदुत्ववादियों का सपना है भारत को पाकिस्तान की तरह धर्म-मजहब पर आधारित देश बनाने का, उन्होंने या तो पाकिस्तान देखा नहीं है या उनकी राजनीतिक सोच इतनी थोड़ी है कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे कितना डरावना सपना देख रहे हैं। पाकिस्तान मुसलमानों के लिए भी सपनों का देश नहीं है।
उसके निर्माण के कुछ ही वर्ष बाद साबित हो गया था कि इस नए इस्लामी देश की हवा इतनी जहरीली थी कि लोकतंत्र यहां सांस तक न ले सकेगा। सेना ने जब सत्ता और शासन अपने हाथों में लेकर राजनेताओं को उनकी जगह दिखा दी, तो कई बार चुनाव करवाए गए, लेकिन इन चुनावों का नियंत्रण सेना ने अपने कब्ज़े में रखा। पाकिस्तान के लोकतंत्र को हमेशा से ‘बोनसाई’ लोकतंत्र कहा जाता है, यानी ऐसा पौधा, जिसकी जड़ काट दी गई हो, ताकि वह कभी पूरी तरह बढ़ न पाए। आज भी यही हाल है। बल्कि कुछ राजनीतिक पंडित तो यहां तक मानते हैं कि इमरान खान पूरी तरह पाकिस्तानी सेना के हाथों की कठपुतली हैं।
मैं जब भी पाकिस्तान गई हूं, मुझे वहां कुछ दिन रहने के बाद एक अजीब घुटन-सी महसूस होने लगी है, जो इतनी तकलीफ देती है कि भारत वापिस आने के बाद झुककर इस धरती को चूमने का मन करता है। मेरी दादी बताया करती थीं कि बंटवारा होने के कुछ दिन बाद जिस दिन वह पहली बार भारत आई थीं, तो अमृतसर पहुंचने पर उनकी ट्रेन के तमाम यात्री उतरकर स्टेशन के प्लेटफार्म को चूमने लग गए थे। मेरी दादी बताती थीं कि जिस दिन वह आई थीं, उस दिन लाहौर से अमृतसर पहुंचने वाली बाकी ट्रेनों में सिर्फ लाशें थीं।
इतने रक्तपात के बाद जब कोई देश जन्म लेता है और वह भी सिर्फ मजहब के नाम पर, तो उसका भविष्य कैसे अच्छा हो सकता है? सो कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि दशकों से दुनिया की नजरों में पाकिस्तान एक विफल, नाकाम देश रहा है, जिसकी भारत के साथ तुलना करना बहुत पहले बंद कर दी थी विश्व के बड़े नेताओं ने। लेकिन जब हमारे अपने राजनेता ही पाकिस्तान के साथ हमारी बराबरी करने लगते हैं, तो बहुत बुरा लगता है हम जैसों को, जिन्होंने पाकिस्तान देखा है। भारत और पाकिस्तान में स्वर्ग और नरक का अंतर है और हमेशा रहा है। दुआ कीजिए कि इस अंतर में कभी थोड़ी-सी भी कमी नहीं आए।