इन राष्ट्रीय विजेताओं ने संपत्ति का निर्माण किया। इन लोगों ने विशाल मध्य वर्ग को भी जन्म दिया, जिनमें कर्मचारी और अंशधारी, दोनों शामिल थे। बड़े कारोबारों की मेहरबानी से मध्यम और छोटे कारोबार भी फले-फूले। जोखिम लेने की संस्कृति ने जन्म लिया। भारतीय उद्योग ने निर्यात से जुड़े निराशावाद से छुटकारा पाया। आदित्य बिड़ला एक भारतीय विनिर्माण कंपनी को विदेश लेकर गए और उन्होंने विदेशी निवेश की एक नई प्रवृत्ति का आगाज किया।
1991-92 में स्थिर मूल्यों पर भारत की जीडीपी 25.4 लाख करोड़ रुपये थी। 2003-04 में यह दोगुना होकर 50.8 लाख करोड़ रुपये हो गई। वर्ष 2014 में यह फिर से दोगुना होकर 100 लाख करोड़ से अधिक हो गई। यह बहुत अधिक धन है। 1991-92 में वर्तमान मूल्य पर आधारित प्रति व्यक्ति आय 6835 रुपये थी, जो 2021-22 में बढ़कर 1,71,498 रुपये हो गई।
हमने गरीबों को विफल कर दिया
इस बात की चर्चा है कि भारत एक मध्यम आय वाला देश बन गया है, लेकिन मेरे दृष्टिकोण में यह अभी उससे कुछ दूर है। कहा जा रहा है कि भारत दुनिया की पांचवीं (नहीं, एक मंत्री ने तो कहा, चौथी) 'सबसे बड़ी' अर्थव्यवस्था है, लेकिन याद रखें कि भारत अभी तक एक मध्यम आय वाला देश नहीं है, अमीर देश होने की तो बात ही छोड़ दें। भारत के पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की भी बात की जा रही है, लेकिन मेरे दृष्टिकोण में यह एक अर्थहीन लक्ष्य है। भारतीय अर्थव्यवस्था भले ही रेंगती रहे, एक दिन उस मुकाम तक पहुंच ही जाएगी। (एक साइकिल भी किसी सवार को दिल्ली से आगरा पहुंचा देगी, जैसे रॉल्स रॉयस)। आर्थिक दृष्टि से ये आप्रासंगिक हैं। प्रासंगिक और अर्थपूर्ण है, आय और संपत्ति का वितरण, विकास मॉडल की स्थिरता और पर्यावरण पर उसका प्रभाव। उन उपायों से भारतीय विकास की कहानी ने निचले क्रम की पचास फीसदी आबादी को विफल किया है। निचले क्रम के पचास फीसदी लोगों को राष्ट्रीय आय का सिर्फ 13 फीसदी मिला (चैनसेल, पिकेटी इत्यादि) और उनके पास सिर्फ तीन फीसदी राष्ट्रीय संपत्ति है (ऑक्सफेम)।
व्यावहारिक रूप में यहां कोई संपत्ति कर नहीं है। कोई विरासत कर नहीं है। कृषि आयकर दायरे से बाहर है। रिश्तेदारों से मिलने वाले तोहफे कर मुक्त हैं। नतीजतन, अमीर लोगों के लिए अपनी संपत्ति और आय का अपने परिवार के सदस्यों में वितरण करना आसान होता है।
निचले क्रम के पचास फीसदी लोग गरीब हैं, क्योंकि उनके पास बहुत थोड़ी-सी संपत्ति है, थोड़ी आय है और आगे बढ़ने के अवसर नहीं हैं। लाखों गरीब लोग हैं, लेकिन हम नाटक करते हैं, मानो हमें उनके बारे में पता ही न हो। शानदार नए पुल आंखों को आकर्षित करते हैं, लेकिन आंखें उन्हीं पुलों के नीचे रहने वाले गरीब परिवारों की उपेक्षा कर देती हैं। सड़कों पर बच्चे पेंसिल या तौलिये या पाइरेटेड किताबें बेचते नजर आते हैं; वे गरीब हैं। तीस करोड़ दिहाड़ी मजदूर हैं; वे गरीब हैं। प्रत्येक वह किसान जिसके पास औसत जोत (एक हेक्टेयर) से अधिक भूमि नहीं है, गरीब है। जिन वर्गों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता उनमें कुपोषण और भुखमरी है; वे लोग गरीब हैं। गरीब और निम्न मध्य वर्ग से मिलकर ही निचली पचास फीसदी आबादी बनती है।
नया महत्वपूर्ण क्षेत्र
प्रचलित नीतियों के कारण देश की संपत्ति में होने वाली वृद्धि का बड़ा हिस्सा शीर्ष पचास फीसदी लोगों के पास चला जाता है। किसी भी राजनीतिक दल ने अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया है, जिससे निचले क्रम के पचास फीसदी लोगों को लाभ हो। पिछले हफ्ते हुए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के रायपुर अधिवेशन में मैंने जोर दिया कि पार्टी को खुली, प्रतिस्पर्धी और उदार अर्थव्यवस्था ( संपत्ति के निर्माण करने के क्रम में) की अपनी प्रतिबद्धता पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए और कांग्रेस पार्टी को निचले क्रम की पचास फीसदी आबादी को गले लगाना चाहिए। यह जाति या धर्म आधारित वोट डालने वाले समूहों पर निर्भरता से एक निर्णायक बदलाव होगा।
इसका विरोध होगा। शीर्ष पचास फीसदी इसका विरोध करेंगे, क्योंकि इससे वह एक आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा हासिल करने में सक्षम नहीं रह जाएंगे। राजनीतिक दलों को दान देने वालों की ओर से प्रतिरोध होगा, जो कि कांग्रेस पार्टी को दिए गए अपना मामूली धन वापस ले लेंगे। उन राजनीतिक दलों में अपने स्पेस को लेकर झगड़ा होगा, जिनके मुख्य निर्वाचन क्षेत्र जाति या धर्म या संकीर्ण पहचान पर आधारित हैं।
साहसी आलिंगन
फिर भी, मैं निवेदन करूंगा कि कांग्रेस पार्टी को अपने मूल निर्वाचन क्षेत्र के रूप में निचले क्रम की 50 फीसदी आबादी को साहसपूर्वक गले लगाना चाहिए। इसके कई कारण हैं। पहला, ऐसा करना नैतिक रूप से सही है। दूसरा, इससे निचले क्रम की पचास फीसदी आबादी की ऊर्जा सामने आएगी, मौजूदा परिस्थितियों में जिसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। तीसरा, यह अधिक लोगों को काम करने या काम की तलाश करने के लिए प्रोत्साहित करेगा और नियोजित व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि करेगा। चौथा, यह अधिक प्रतिस्पर्धा और दक्षता को बढ़ावा देगा। पांचवां, 'निचले क्रम के पचास फीसदी', का पैमाना धार्मिक, जातिगत, भाषायी, लैंगिक, क्षेत्रीय और राज्यों सभी जगह प्रभाव डालेगा। और अंत में, यह यह हिंदुत्व के जहरीले ध्रुवीकरण के लिए एक मारक साबित हो सकता है ( इसे हिंदुइज्म न समझें)।
निचले क्रम की पचास फीसदी आबादी जिन परिस्थितियों में रहती है, वह औपनिवेशिक शासन की परिस्थितियों से बहुत अलग नहीं है। यह राजनीतिक दलों या विधानसभाओं और संसद में प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व नहीं करती है। निचले क्रम के पचास फीसदी लोग खुद को मान्यता दिए जाने और गले लगाए जाने का इंतजार कर रहे हैं, और उनमें विजेता बनने की क्षमता है।