यकीनन पिछले तीन महीनों में जिस तरह कारोबार, निर्यात, निवेश और विकास दर बढ़ने का जो रुझान दिखाई दिया है, उस आधार पर वित्त वर्ष 2014-15 के लिए कर संग्रह में 18 फीसदी इजाफे का रखा गया लक्ष्य, नरेंद्र मोदी सरकार प्राप्त कर सकती है। हालांकि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही की तुलना में चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी कर संग्रह में गिरावट रही है। मगर आर्थिक परिदृश्य में सुधार के कारण प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कर आय बढ़ाने के रणनीतिक प्रयासों से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
देश में कर आय बढ़ाने के नए रणनीतिक प्रयासों के तहत यह जरूरी है कि सरकार प्रत्यक्ष कर के महत्वपूर्ण स्रोत आयकर पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करे। हालांकि पिछले तीन साल के दौरान आयकरदाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है, मगर अब भी यह संख्या आबादी का तीन प्रतिशत भी नहीं है। भारत के करीब 90 फीसदी करदाता उस श्रेणी में आते हैं, जिनकी कर योग्य आय पांच लाख रुपये वार्षिक तक है। कुल आयकर संग्रह में इस आयकर श्रेणी की हिस्सेदारी महज दस फीसदी ही है।
जबकि कुल करदाताओं में से सिर्फ दो फीसदी 20 लाख रुपये वार्षिक या इससे अधिक आय की श्रेणी में आने के बावजूद इस आयकर श्रेणी की आयकर संग्रह में 63 फीसदी हिस्सेदारी है। इन श्रेणियों में आयकरदाताओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है। लेकिन यदि आयकर विभाग करोड़पति वर्ग के आयकरदाताओं पर ध्यान दे, तो कर संग्रह में सुधार हो सकता है। उल्लेखनीय है कि मल्टी मिल्यनेर फिनॉमिनन-2014 न्यू वर्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2013 में भारत में एक करोड़ डॉलर की शुद्ध संपत्ति वाले करोड़पतियों की संख्या जहां 2,14,000 थी, वहीं यह संख्या 2014 में बढ़कर 2,26,800 हो गई है। जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक करोड़ रुपये से अधिक की आय पर कर चुकाने वालों की संख्या मात्र 42,800 ही है।
इस उच्चतम आयकर वर्ग के तहत आयकरदाताओं की संख्या सरलता से बढ़ाई जा सकती है। इस बात पर ध्यान देना होगा कि एक जुलाई, 2014 को आयकर के जो 3.29 लाख करोड़ रुपये बकाए हैं, उसकी वसूली के प्रभावी प्रयास हों। साथ ही कर चोरी वाले संभावित क्षेत्रों को चिह्नित करके उन पर विशेष ध्यान देना होगा। खासतौर से निर्माण, रियल एस्टेट और ठेके पर होने वाले काम, अचल संपत्ति को किराये पर देने, बिजनेस सपोर्ट सेवाएं, व्यक्तिगत आपूर्ति एवं सिक्योरिटी सेवाएं और सामानों के परिवहन ऑपरेटर आदि के कर भुगतान पर निगाहें रखनी होंगी।
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के उन सख्त निर्देशों पर भी ध्यान देना होगा, जिसमें कहा गया है कि आयकर कार्यालयों में करदाताओं को अधिक इंतजार न करना पड़े तथा काम में सरलता रखी जाए। आयकर अधिनियम को सरल बनाने और आयकर आधार बढ़ाने के लिए तैयार की गई प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) को शीघ्रतापूर्वक धरातल पर लाने के प्रयास भी करने होंगे। उम्मीद है कि नई सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी।
(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)