दस राज्यों के 33 विधानसभा और तीन लोकसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनाव के जो नतीजे आए हैं, वे अप्रत्याशित रूप से भारतीय जनता पार्टी के लिए निराशाजनक हैं। यह कम हैरानी की बात नहीं है कि जिस दल को लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता ने भारी बहुमत से जिताया था, उसे इस उपचुनाव में ग्यारह में से मात्र तीन सीटें ही मिलीं। वह भी तब, जब ये सभी सीटें भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों की थीं। आखिर भाजपा के प्रति लोगों के मोहभंग की वजह क्या है?
असल में लोकसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से मीडिया का हौव्वा खड़ा करके नरेंद्र मोदी की महामानव की छवि गढ़ी गई थी, सत्ता में आने के बाद लोगों को मोदी की वह छवि दिखाई नहीं दी। उस समय बड़े-बड़े वायदे किए गए थे, जिससे लोगों की आकांक्षाएं इतनी बढ़ गई थीं कि वे मानने लगे कि मोदी के आते ही सबकुछ अच्छा हो जाएगा। मसलन, उत्तर प्रदेश में विकास की गंगा बहने लगेगी, दस दिनों के भीतर बनारस को चमका दिया जाएगा, चीन एवं पाकिस्तान को सबक सिखा दिया जाएगा, विदेशों में जमा काला धन देश में लाया जाएगा, आदि-आदि। किसी ने गुजरात जाकर देखा नहीं था कि वहां की वस्तुस्थिति क्या है, लेकिन लोगों ने मान लिया था कि उनके शहर को भी गुजरात की तरह स्वर्ग बना दिया जाएगा। यह हाइपर रियलिटी की स्थिति थी, जिसका जमीनी हकीकत से सामना होते ही मोहभंग शुरू होने लगता है। यही वजह है कि जब लोगों को अपने जीवन में कोई बदलाव होता नहीं दिखा, तो उनका भाजपा से मोहभंग हुआ। दूसरी बात, उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय अस्मिता की पहचान बहुत मायने रखती है। यह अब भी लोगों में बची हुई है। जिन पिछड़ी व दलित जातियों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया था, उन्होंने देखा कि मोदी सरकार ने उनकी जाति के हित में कोई कदम नहीं उठाया।
लोकसभा चुनाव की जीत के बाद जिस तरह से भाजपा नेताओं ने बढ़-चढ़कर बातें करनी शुरू कीं, उससे भी लोगों के मन में एक वितृष्णा पैदा हुई। यह भाजपा की हार का तीसरा अहम कारण है। चुनाव के बाद भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं में अतिआत्मविश्वास के भाव दिखने लगे थे। लोगों को महसूस होने लगा कि उनके साथ छल हुआ है। यही वजह रही कि इस बार लोगों ने धर्म और जाति के आधार पर नहीं, बल्कि भाजपा को हराने के लिए वोटिंग की।
चौथा बड़ा कारण भाजपा के संगठन से जुड़ा है, जिसके चलते भाजपा को उत्तर प्रदेश में इस अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है। प्रदेश में भाजपा का संगठन बेहद कमजोर है। लोकसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने बूथ लेवल पर भाजपा के लिए काम किया था। संघ के लिए चुनाव साधन है, साध्य नहीं। कुछ दिनों पहले मोहन भागवत ने साफ कह दिया था कि उपचुनावों में संघ कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव की तरह सक्रिय नहीं रहेंगे। इसलिए इस बार संघ कार्यकर्ताओं की सक्रियता भी कम रही। साथ ही इस बार भाजपा का कोई एक चेहरा नहीं था, बल्कि पार्टी ने तीन नेताओं को आगे किया था-लक्ष्मीकांत वाजपेयी, कलराज मिश्र और योगी आदित्यनाथ। इसमें से मीडिया ने योगी आदित्यनाथ को भाजपा के भावी मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया, जिससे पार्टी में आंतरिक संघर्ष बढ़ा ही। जबकि योगी पूर्वांचल से बाहर एक नेता के रूप में स्वीकार्य नहीं हैं।
जहां तक सांप्रदायिक राजनीति की बात है, तो चुनावी राजनीति में अकेले सांप्रदायिकता कोई बड़ा खेल नहीं कर पाती है। धर्म या जाति की राजनीति तभी आगे बढ़ती है, जब उसके साथ बड़ा सामाजिक मुद्दा जुड़ा हो। जाति की राजनीति जब विकास के साथ जुड़ती है, तो नीतीश कुमार जैसा नेता सामने आता है। लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक राजनीति के कामयाब होने के पीछे असली वजह थी, नरेंद्र मोदी के विकास का वायदा। लेकिन इस बार सांप्रदायिक राजनीति अकेली पड़ गई, इसलिए वह कोई बड़ा खेल नहीं कर पाई।
लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि प्रदेश की अखिलेश सरकार ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार ला दिया है, जिससे प्रभावित होकर लोगों ने सपा को वोट दिया है। असल में, भाजपा के बड़े-बड़े वायदों से लोगों के मोहभंग का लाभ समाजवादी पार्टी को मिला है। बेशक बहुजन समाज पार्टी ने सीधे मुकाबला न करके कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों को समर्थन दिया था। मगर आम तौर पर जनता निर्दलीय उम्मीदवारों पर बहुत भरोसा नहीं करती, इसलिए बसपा के मतदाताओं ने भी इस बार सपा के पक्ष में मतदान किया। भले ही दलितों का कुछ वोट भाजपा को भी मिला होगा, पर ज्यादातर वोट सपा के पक्ष में गया है। हालांकि सपा ने इस बार अपने कई वरिष्ठ मंत्रियों को चुनाव प्रचार में झोंक दिया था, जिसका उसे लाभ मिला।
इसी तरह कांग्रेस अगर राजस्थान और गुजरात में वापसी करती दिख रही है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों का भरोसा कांग्रेस नेतृत्व में लौट आया है, बल्कि भाजपा से निराश मतदाताओं के सामने कांग्रेस ही विकल्प के रूप में मौजूद थी।
आम तौर पर उपचुनाव के नतीजों को लोग गंभीरता से नहीं लेते और जैसा कि भाजपा के प्रवक्ता कह रहे हैं कि इन चुनावों में स्थानीय कारकों की मुख्य भूमिका होती है, लेकिन इस जनादेश का भविष्य की राजनीति के लिए एक बड़ा संदेश है। आगामी कुछ महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, ये जनादेश उसे भी प्रभावित कर सकते हैं। क्या वजह है कि पहले उत्तराखंड, फिर बिहार और अब उत्तरप्रदेश, राजस्थान, गुजरात में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। ये नतीजे भाजपा के लिए झटके की तरह हैं, जिसके निहितार्थों को उसे समझना होगा।
(लेखक गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के प्रोफेसर हैं)