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अरुणा के कठघरे में

Sun, 31 May 2015 04:01 PM IST
कुमार प्रशांत
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चौबीस साल की खिलती उम्र की अरुणा के.ई.एम. अस्पताल में नर्स बनकर आई थी; और फिर वहीं खत्म भी हो गई। उसकी इस 42 साल लंबी मौत-यात्रा में जितनी नर्सें अस्पताल में आईं सुनता हूं, उन सबने अरुणा को अपनी जिम्मेदारी समझा और उसकी सेवा की। एक नर्स कह रही थी कि सवाल इसका नहीं था कि अरुणा के पास किस नर्स की ड्यूटी लगी है, क्योंकि अस्पताल की सारी नर्सें चौबीस घंटों में कभी-न-कभी उसे देख ही आती थीं, क्योंकि वह सारी नर्सिंग पेशे की प्रतीक बन गई थी। हुआ यह था कि उसी अस्पताल के वार्ड बॉय सोहनलाल बाल्मीकि ने अरुणा पर कामुक हमला किया, उसे दबोच कर, घसीटते हुए एक सुनसान कमरे में ले गया और किसी पशुवत् उन्माद में उसका हिंसक बलात्कार किया, कुत्तों को बांधने वाली लोहे की चेन उसके गले में लपेट कर, उसे अवश करने की क्रूरता की और अंतत: उसे मरणासन्न कर निकल गया।
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अरुणा शानबाग के साथ जो हुआ उसके बाद चिकित्सा विज्ञान के पास उसे देने के लिए कुछ भी नहीं था। बहुत कर के भी वह इतना ही कर सका कि उसने उसके अर्थहीन जीवन की मौत को लंबा खींच दिया। अदालत से जो भी मिलता, उसे लेने और उसे समझने की संभावना से अरुणा बहुत दूर चली गई थी, लेकिन ऐसे मामलों में जैसा होता है, वैसा ही होता कि अदालत से जो भी मिलता अरुणा को, वह सारे समाज का हो जाता। समाज कुछ ज्यादा सभ्य व संवेदनशील हो जाता। लेकिन तब अदालत अपनी इस भूमिका से अनजान थी। इसलिए उसने बलात्कारी सोहनलाल को मात्र सात साल की सजा दी मानो किसी दुर्व्यवहार की सजा दी गई हो।

अदालत ने ऐसा क्यों किया? कहा जा रहा है कि 1973 में बलात्कार के कानून के दायरे में जबर्दस्ती से किया अप्राकृतिक यौन उत्पीड़न शामिल ही नहीं था। अस्पताल के अधिकारियों ने कभी यह सोचा ही नहीं कि उनके परिसर में, काम पर आई हुई उनकी ही नर्स के साथ, उनके ही एक कर्मचारी ने बलात्कार व हत्या जैसा भयानक कुकृत्य किया है, तो पहली और अंतिम जिम्मेदारी उसकी ही बनती है कि वह सरकार, अदालत को मजबूर करे कि वे अस्पताल व अरुणा के साथ खड़े हों। सरकार ने भी हमेशा की तरह अपनी इस जिम्मेदारी का एहसास किया ही नहीं कि उसका कोई भी नागरिक प्रताड़ित, अपमानित या बलात्कारित होता है, तो यह किसी व्यक्ति का नहीं, राज्यसत्ता का अपमान है, उसकी हैसियत को चुनौती है। न्याय का आधारभूत सिद्धांत कहता है कि अपराध की तुलना में सजा छोटी या बड़ी नहीं होनी चाहिए। वह ऐसी होनी चाहिए कि कानूनविद भी और सड़क पर चलने वाला समाज भी माने कि सही व पक्की सजा मिली। एक वह भी सज्जन थे, जिनके लिए कहा जा रहा है कि वह उसी अस्पताल में डॉक्टर थे और अरुणा के साथ उनकी सगाई हो चुकी थी, बाकी थी शादी। इस पूरी कथा में वह कहीं भी नहीं आते हैं। किसी ने जिक्रवश कहा कि वह कभी-कभार अरुणा को देखने आते थे। लेकिन उन्होंने एक बार भी यह जिम्मेदारी नहीं ली कि अगर अरुणा की लाश के इतने रखवाले हैं, तो मैं उसकी जिंदगी के सवाल उठाने वाला बनूंगा। अगर वह ही अदालत में चले जाते और सिर्फ इतना ही पूछते कि सजा और अपराध में यह कैसा असंतुलन है, तो वैसे कितने ही सवाल खड़े हो जाते, जो निर्भया के मामले में, लोगों के सड़कों पर उतर आने से खड़े भी हुए और आकार भी ले सके।
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1998 में पिंकी विरानी नाम की पत्रकार ने जब अरुणा का यह पूरा मामला एक किताब की शक्ल में समाज के सामने रखा, तब भी उन डॉक्टर महाशय के लिए अवसर बना था कि वह बोलते। विरानी ने 2009 में सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की कि जिस अवस्था में अरुणा को जिंदा रखा जा रहा है, वह उसकी जिंदगी का शर्मनाक अपमान है और इसलिए उसे मृत्यु चुनने का अधिकार दिया जाए। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कानून के हाथ से नहीं, आंख से काम लिया और कहा, अरुणा जैसी अवस्था में है और जिससे बेहतर अवस्था में उसके आने की कोई संभावना नहीं है, वैसे में उसे जिंदा रखने की कृत्रिम कोशिशें रोक देनी चाहिए और उसे स्वाभाविक रूप से मौत की तरफ जाने देना चाहिए।
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अस्पताल, अदालत और समाज सभी कठघरे में खड़े हैं। अरुणा पूछ रही है और एक जवाब हम सब पर उधार है।
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