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प्रवासी मजदूरों के हित में

Tue, 01 Sep 2015 08:23 PM IST
वरुण गांधी
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भारतीय ठेका व्यवस्था (गुलामी की जगह कर्ज के बदले बंधुआ मजदूरी का एक रूप) के कारण पैंतीस लाख भारतीय विभिन्न यूरोपीय देशों में गन्ने की खेती के लिए गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गए थे। उन्हें बहुत कम मजदूरी दी जाती थी और अनुबंध में करार का उल्लंघन करने पर दो महीने की कैद या पांच डॉलर जुर्माने का भी प्रावधान था। धोखेबाजी से काम कराना आम बात थी, क्योंकि बागान मालिक अक्सर उनके यात्रा दस्तावेज जब्त कर लेते थे और घर वापसी के विचार को त्यागकर उन्हें जबरन मजदूरी करने के लिए बाध्य करते थे। यदि मजदूर काम नहीं करते, तो उन्हें मजदूरी या खाना नहीं दिया जाता था और वे अभावों से जूझते रहते थे। प्रधानमंत्री मोदी हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा से लौटे हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि खाड़ी देशों में ऐसी अशोभनीय परिस्थितियों से जूझ रहे भारतीय मजदूरों की समस्याओं पर रोशनी डाली जाए।
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दक्षिण एशिया के लोगों का राष्ट्रीय सीमा से बाहर प्रवास एक ऐतिहासिक तथ्य है। समाज विज्ञानी किंग्सले डेविस का आकलन था कि 1834 के बाद से तीन करोड़ भारतीय प्रवासी बन गए और यह आंकड़ा यूरोप से अमेरिका गए प्रवासियों की संख्या के बराबर है। अकुशल श्रमिकों के लिए विदेश प्रवास एक भयानक अनुभव होता है, क्योंकि वे बिचौलियों के माध्यम से वहां जाते हैं और एक तटस्थ विदेशी सरकार के तहत अमानवीय व्यवहार करने वाले बेईमान नियोक्ताओं के अधीन काम करते हैं। सऊदी अरब के निताकत कार्यक्रम (2011) के तहत पाया गया कि वहां 28 लाख प्रवासी भारतीय श्रमिक काम करते हैं, जिनमें से आधे के पास वहां रुकने या काम करने का उचित कानूनी दस्तावेज नहीं था। पिछले दो वर्षों में कतर विश्वकप से संबंधित निर्माण कार्यों के दौरान सात सौ से ज्यादा प्रवासी भारतीय मजदूरों की मौत हो गई। पूरे खाड़ी देशों में निर्माण उद्योगों में लगे श्रमिकों का एक-एक कमरे में बारह लोगों का सोना आम बात है। कइयों को बिना मजदूरी के काम करने के लिए मजबूर किया जाता है और पेट भरने के लिए भीख मांगने के लिए छोड़ दिया जाता है। लगता है कि गिरमिटिया की प्रथा खत्म नहीं हुई।

स्वतंत्र भारत में विदेश प्रवास दो तरह से होता है। एक तो पेशेवर अनुभव और तकनीकी हुनर वाले लोग पश्चिमी देशों में स्थायी प्रवासी के रूप में जाते हैं, दूसरे अकुशल या अर्धकुशल श्रमिक अस्थायी ठेके पर इन देशों में जाते हैं। 1979 के तेल संकट ने खाड़ी के तेल निर्यातक देशों में सस्ते, अकुशल श्रमिकों की मांग में बढ़ोतरी की, जब बड़ी संख्या में (1980 तक 28 लाख मजदूर) मजदूरों का पलायन हुआ। इनमें सबसे ज्यादा योगदान (60 फीसदी) तीन राज्यों-केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का है, जहां के प्रवासी मजदूर भारत में विदेशों से भेजे जाने वाले धन का 20 फीसदी यानी 71 अरब डॉलर से ज्यादा भेजते हैं।
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हमें हमारे अंतरराष्ट्रीय प्रवासी मजदूरों के स्तर को बेहतर ढंग से समझने की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय प्रवास से संबंधित उचित सूचना तंत्र, बेहतर निगरानी व्यवस्था और प्रबंधन विकसित करने की जरूरत है। भारतीय दूतावासों में प्रवासी मजदूरों द्वारा प्रवेश पंजीयन अनिवार्य बनाने से बाहर जाने वाले प्रवासियों से संबंधित आंकड़े की गुणवत्ता बढ़ेगी।

हमें सऊदी अरब के साथ विस्तृत श्रम नीति तैयार करना चाहिए, क्योंकि खाड़ी सहयोग परिषद का यह अकेला ऐसा देश है, जिसके साथ हमने अब तक इस तरह का अनुबंध नहीं किया है। इसके लिए स्किल इंडिया मिशन के उपयोग की जरूरत है। हमें खाड़ी देशों में श्रम बाजार की गतिशीलता का विस्तृत अध्ययन करना चाहिए, जो एक बेहतर आप्रवासन नीति बनाने से लेकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए श्रमिकों को प्रशिक्षित एवं तैयार करने में हमारी मदद करेगा। मेजबान देश के साथ वार्ता के जरिये एक जीवंत मजदूरी का फार्मूला तैयार किया जाना चाहिए।

बेशक आप्रवासन कानून के माध्यम से आप्रवासन मंजूरी और भर्ती एजेंटों के पंजीयन के जरिये प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाए गए हैं, पर अब भी कई चुनौतियां हैं। ज्यादातर अप्रवासियों से जुड़ी हुई जो अन्य समस्याएं हैं, उनमें समय से पहले रोजगार अनुबंध समाप्त होना, श्रमिकों का नुकसान करने के लिए ठेके के प्रावधान में परिवर्तन, वेतन भुगतान में देरी, न्यूनतम मजदूरी मानक का उल्लंघन और श्रमिकों को अपने पास पासपोर्ट नहीं रखने देना शामिल है। जिनमें शिकायत का पर्याप्त साहस है, वह भी अपने नियोक्ता का कुछ बिगाड़ नहीं सकते, केवल स्थानीय दूतावास द्वारा भर्ती एजेंटों को काली सूची में डाला जाता है। चूंकि विदेशी नियोक्ता दूसरे देश के कानून के दायरे में होते हैं, इसलिए उन्हें आम तौर पर छुआ भी नहीं जा सकता।

इसलिए हमारे आप्रवासन कानून में महत्वपूर्ण बदलाव करने की जरूरत है। श्रम बाजार की निगरानी के लिए एक प्राधिकरण की जरूरत है, जो विभिन्न श्रम अनुबंधों पर बातचीत करने के साथ ही उभरते कौशल जरूरतों का विश्लेषण कर सके। आर्थिक रूप से कमजोर प्रवासियों को अगर सरकार समर्थित व्यवस्था से कम ब्याज दर पर विदेश जाने के लिए धन उपलब्ध कराया जाए, तो ऐसे प्रवासी अपने घर धन भेजने के लिए औपचारिक बैंकिंग माध्यमों का उपयोग करेंगे। दूतावासों को आभिजात्य केंद्रों के बजाय भारत सरकार के सुलभ प्रतिनिधियों के रूप में तब्दील किया जाना चाहिए। अधिकारियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए कि वे समय-समय पर श्रमिक शिविरों और कार्यस्थलों का दौरा करें और यह देखें कि उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया जा रहा है।

भारत को सऊदी अरब, कुवैत, लेबनान और संयुक्त अरब अमीरात की सरकार के साथ अपनी कूटनीतिक क्षमता और प्रभाव का उपयोग करना चाहिए, ताकि वे मानक श्रम रक्षक कानूनों का विस्तार करें, वैसे आप्रवासन कानून में बदलाव करें, जो श्रमिकों को नियोक्ता बदलने में मुश्किलें खड़ी करते हैं और उत्पीड़न का शिकार होने वाले श्रमिकों के लिए मुआवजा सुनिश्चित करें।
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