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स्मार्ट सिटी का बाशिंदा

Mon, 31 Aug 2015 07:48 PM IST
अंशुमाली रस्तोगी
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मेरे शहर का नाम भी 'स्मार्ट सिटी' की सूची में शामिल हो गया है। भविष्य में मेरा शहर स्मार्ट सिटी के नाम से जाना जाएगा। यह मेरे लिए खुशी का विषय है। अब मैं भी लोगों से सीना तानकर कह सकूंगा कि मैं स्मार्ट सिटी का बाशिंदा हूं।
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अभी तलक तो इंसान और वस्तुएं ही स्मार्ट हुआ करती थीं। मगर अब शहर भी स्मार्ट हो जाएंगे। स्मार्ट शहर देखने में कैसे लगेंगे, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। तब तो शहरों में हर ओर स्मार्टनेस बिखरी पड़ी होगी। गली-मोहल्ले से लेकर सब्जी मंडी तक स्मार्ट होगी। यहां तक कि गाय-भैंसे तक स्मार्ट हो जाएंगी। बेहद स्मार्टनेस के साथ वे दूध दिया करेंगी। शहर या लोग जब ओवर स्मार्ट हो जाते हैं, तो फिर उनके भीतर मौजूद छोटी-छोटी 'अन स्मार्ट बातें' कोई खास मायने नहीं रखतीं।

मसलन, क्या हुआ, जो शहर में एकाध जगह गढ्डे रह जाएंगे। क्या हुआ, जो मलिन बस्तियों को शहर से खदेड़ कर बहुत दूर फेंक दिया जाएगा। क्या हुआ, जो रात में हमारे शहरों की कई गलियों में अंधेरा ही पसरा रहेगा। क्या हुआ, जो गरीब स्मार्ट सिटी में घुसने के बारे में सौ बार सोचेंगे। क्या हुआ, जो स्मार्ट सिटी का बंदा काइयां होगा। क्या हुआ, जो मरीज के गुजर जाने के बाद एंबुलेस पहुंचेगी।
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आधुनिक होने से कहीं ज्यादा जरूरी होता है आधुनिकता का बोध। तो यह बदलाव मेरे शहर में धीरे-धीरे अब नजर आने लगा है। स्मार्ट सिटी में जब हर बंदा कानों में ईयरफोन और हाथों में स्मार्टफोन लेकर घूमेगा, तो कितनी उम्दा फीलिंग आएगी, इसे महसूस किया जा सकता है।

चूंकि मेरा शहर स्मार्ट सिटी होने की राह पर आगे बढ़ चुका है, तो उसके अनुरूप अब मैं भी ढलने की कोशिश में लग गया हूं। यानी, धीरे-धीरे मैं भी स्मार्ट हो रहा हूं। स्मार्ट सिटी में रहने के लिए खुद का भी स्मार्ट होना बेहद जरूरी है, ताकि कल को कोई मुझ पर 'ओल्ड-फैशन्ड' होने का आरोप न लगा पाए। यों भी, स्मार्ट सिटी में रहने वालों की बात ही कुछ और होती है।
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