हर कहानी के पीछे एक कहानी होती है। मेरे नॉवेल ‘सीताज कर्स’ की शुरुआत मुंबई में हुई थी, जब मैं टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकार थी। मैं रोज दोपहर सवा दो से पौने तीन बजे के बीच भायखला की एक चाल से गुजरती थी। चाल की बालकनी में मुझे हर दिन एक औरत दिखती थी। बहुत ही खूबसूरत। ऐसा लगता, मानो वह किसी महाकवि की कल्पना हो या किसी ऐतिहासिक पेंटिंग से निकल कर आई नायिका। उसमें जबर्दस्त आकर्षण था। कभी वह कपड़े सुखा रही होती, कभी खिड़की में टंगे पिंजरे में बंद तोते को मिर्ची खिला रही होती। उससे बातें कर रही होती। इस दौरान अक्सर कुछ पल को हमारी नजरें टकरा जाती थी। मैं सोचती थी कि उसका परिवार कैसा होगा, पति कैसा होगा, बच्चे कैसे होंगे? अपनी तन्हाई में वह क्या करती है? क्या उसका कोई प्रेमी होगा? वह मुझे पिंजरे में बंद किसी खूबसूरत पंछी की तरह लगती थी। करीब दो साल तक लगातार यह सिलसिला रहा। इसके बाद मुंबई में जुलाई, 2005 की भीषण बरसात हुई। खुद मुझे तीन दिन लगे थे घर पहुंचने में। मैं बीमार पड़ गई। तीन हफ्ते में मैं स्वस्थ हुई और दफ्तर के लिए निकली। लेकिन उस बरसात के बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा। उसकी आंखें, उसका अकेलापन मैं कभी भूल नहीं सकी। मैंने उसे अपने उपन्यास में मीरा नाम दिया। हमारे समाज में ऐसी अनेक मीरा हैं, जिनका अकेलापन, जिनका दुख, जिनके साथ होने वाले अन्याय कभी प्रकाशित नहीं होते। वे खुद बोल नहीं पातीं। घुट-घुटकर जीती हैं।
जब मुझे मीरा नहीं दिखी, तो मैंने चाल की जिंदगी का अध्ययन किया, जो दूसरी जगहों की जिंदगी से बहुत अलग है। वहां एक ही कमरे में बड़े-बड़े परिवार रहते हैं। लेकिन लोग तन्हा होते हैं। मैंने अक्सर घरों से बाहर रहने वाले व्यवसायियों से बातें की। उनकी स्त्रियों से मैं मिली। मैंने कई औरतों से बात की जो ‘मैरिटल रेप’ की शिकार हैं। नॉवेल की मीरा 22 साल तक यह सहती है। उसके पति में कमी होने के बावजूद मां न बन पाने पर वह दोषी मानी जाती है। हमारे देश में यौनिकता को लेकर बहुत सारा पर्दा है। कुछ बातें तो समाज ने तय कर दी हैं। स्त्री से कहा गया है कि उसे जितना भी दुख मिले, चुपचाप सहना है। सुप्रीम कोर्ट भी विवाह संबंधों में महिलाओं पर होने वाले यौन अत्याचारों पर ठोस रुख नहीं अपनाता। इसे बंद कमरे में पति-पत्नी के बीच का व्यवहार मान लिया जाता है।
कड़वा सच यह भी है कि अगर स्त्री मां नहीं बन पा रही होती, तो परिवार की महिलाएं उसे बाबाओं के चक्कर में भी डाल देती हैं,चाहे मां हो, बहन हो, ननद हो। मीरा को उसकी सास बाबाजी के पास भेजती है। जब कभी आसाराम या नित्यानंद जैसों का मामला सामने आता है, तो मीडिया हल्ला मचाता है। आप गौर से देखिए कि इस तरह के बाबाओं के भक्तों में 90 फीसदी महिलाएं हैं। यह जो चल रहा है, इसकी जड़ें हमारे पौराणिक ग्रंथों में हैं। गृहस्थों के यहां कितनी महान आत्माओं का जन्म साधुओं, संतों, ऋषियों, देवताओं से दिखाया गया है।
समाज में स्त्री-पुरुष सबके अपने अधिकार हैं। सबके विरुद्ध अपराध होते हैं। लेकिन महिलाओं के प्रति अपराध ज्यादा हैं। मुझे लगता है कि पौराणिक सीता हमारे देश में हर स्त्री की जीवन यात्रा का प्रतीक है। मेरी किताब में भी सीता एक प्रतीक है। स्त्री की तकलीफों का प्रतीक। एक औरत के जीवन में जितनी उत्सवधर्मिता होती है, उसे उतना ही कष्ट भी मिलता है। वह अपनी खुशियों की कीमत चुकाती है।
मुझसे पूछा जा रहा है कि आपको ‘सीताज कर्स’ इरॉटिका के रूप में लिखने की क्या जरूरत थी? मैं पूछती हूं कि क्या आप किसी मिस्ट्री राइटर से सवाल करते हैं कि आपने थ्रिलर क्यों लिखा, इसे कॉमेडी में बदलिए। लोगों को यह अजीब इसलिए लग रहा है, क्योंकि हमने पिछले सत्तर साल में ऐसा कुछ नहीं पढ़ा। देश में किसी से पूछिए कि आखिरी बार इरॉटिका कब पढ़ा, तो वह ई.एल.जेम्स के ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’ का नाम लेगा, जबकि वह पोर्न है। सच यह है कि लेखन की शैली कहानी की मांग के अनुसार तय होती है। हर कहानी अपने अंदाज में पाठक और समाज से संवाद करती है।
इरॉटिका पर सवाल इसलिए है कि हमें लगता है यह एक समस्या है। वास्तव में ऐसा नहीं है। समस्या होती, तो दो महीने में इस उपन्यास की तेरह हजार प्रतियां नहीं बिकतीं। हकीकत यह है कि हम समस्याओं से डरते हैं। यह एक बड़ी समस्या है। हमारे समाज में कई बातों को लेकर दोहरे मापदंड हैं। एक लेखिका के रूप में मेरा काम उनका पर्दाफाश करना है। महिलाओं के विरुद्ध अपराध हो रहे हैं, क्योंकि हम उनके बारे में बात नहीं करते। नैतिक पाखंड हैं, इसलिए अपराध हो रहे हैं। किताबों और सिनेमा के कारण अपराध नहीं हो रहे। हम ‘एक डरा हुआ समाज’ हैं। सबसे डरावनी बात तो यह है कि हमारे भीतर जब डर पैदा होता है, तभी हम प्रतिक्रिया करते हैं।