एड्स यानी एक्वायर्ड इम्यून डिफेशियंसी सिंड्रोम पर होने वाले किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से क्या दुनिया में कोई बदलाव आ सकता है? शायद नहीं, मगर इससे पूरी दुनिया में फैली इस बीमारी की ओर वैश्विक समुदाय का ध्यान खींचने में तो मदद मिलती ही है। साथ ही, एड्स से जुड़े उन तमाम मुद्दों पर विमर्श करने का मौका भी मिलता है, जो आए-दिन हमारे सामने आते रहते हैं। अभी पिछले हफ्ते ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर में 20वें एड्स सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें एचआईवी और एड्स के पीड़ितों से जुड़े सवालों के अलावा ऐसे मुद्दे भी उठाए जो हम सभी के लिए बेहद महत्व के हैं। हालांकि एक अफसोसनाक वाकये ने सम्मेलन की शुरुआत को ही फीका कर दिया। दरअसल,उक्रेन के पास जिस विमान को उड़ा दिया गया, उसमें एड्स से जुड़े कई अनुसंधानकर्ता भी सवार थे, जो सम्मेलन में शामिल होने के लिए मेलबोर्न आ रहे थे। इस त्रासदी ने एक बार फिर से हमें जिंदगी की अनिश्चितता का एहसास कराया। जेहन में यह सवाल भी उठा कि सीमित वक्त के लिए जो जिंदगी हमें मिली है, उसे अर्थपूर्ण बनाने के लिए हममें से हर कोई आखिर क्या कर सकता है।
सम्मेलन के उद्घाटन वाले दिन एक युवा इंडोनेशियाई महिला ने जो भाषण दिया, वह मैं ताउम्र नहीं भूल पाउंगी। युवाओं के साथ काम कर रही इंडोनेशिया की इस एड्स कार्यकर्ता एयू ओक्तेरिनी ने कहा,' पिछले पांच वर्षों से मैं एचआईवी के साथ जी रही हूं। और इसकी वजह यह है कि मुझे जानकारी नहीं थी। जो मेरे साथ हुआ, वह एशिया समेत पूरी दुनिया के लिए कोई नई बात नहीं है। मैं सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाले देश की हूं, मगर एड्स को लेकर हमारी स्थिति भी कमोबेश बाकी दुनिया जैसी ही है। तमाम देशों के लोग मेरे साथ काम करते हैं। इनमें हिंदू, बौद्ध, ईसाई, सिख और अनीश्वरवादी सभी शामिल हैं। और हम सभी की समस्या भी एक ही रही। हममें से ज्यादातर लोग एचआईवी से इसलिए नहीं बच पाए, क्योंकि हमारे पास खुद को इस बीमारी से बचाए रखने के साधन नहीं थे।'
एयू बमुश्किल पंद्रह बरस की होगी। इतनी छोटी उम्र में ऐसी बीमारी का होना वाकई अफसोसनाक है। वह एक युवा मां भी थी। ईमानदारी के साथ कहे गए उसके अलफाज दिल को छू रहे थे। इसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि भारत और इंडोनेशिया जैसे सामाजिक तौर पर रूढ़िवादी देशों में ऐसे विषयों पर खुल कर बोलने को ठीक नहीं माना जाता। गौरतलब है कि भारत में भी युवाओं को यौन शिक्षा देने के मामले में तूफान खड़ा होता रहता है। बहुत से लोगों का मानना है कि इससे ऐसे व्यवहार को प्रोत्साहन मिलेगा, जो भारत के सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ है। हाल ही में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्द्धन के एक बयान को लेकर काफी सनसनी फैली थी, जिसमें उन्होंने अपरिपक्व और अश्लील यौन शिक्षा की मुखालफत की थी। मगर सवाल यह है कि इस अपरिपक्वता का निर्धारण कौन करेगा। क्या तेजी से बदलते समय में किसी भी तरह की अज्ञानता का कोई फायदा हो सकता है? एयू का मामला गवाह है कि जानकारी और उचित यौन शिक्षा का अभाव एक युवा के जीवन को किस तरह बर्बाद कर सकता है। अपने युवाओं को किस तरह की यौन शिक्षा दी जाए, इस पर बहस में उलझे भारत के लिए एयू का मामला एक सबक की तरह हो सकता है।
मेलबोर्न सम्मेलन में जो दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह उठा, कि समलैंगिक, ड्रग्स के आदी और उभयलिंगियों पर दंडात्मक कानूनों को लागू करना, कहां तक प्रभावी हो सकता है? यूएनएड्स (एचआईवी/एड्स पर संयुक्त यूनाइटेड नेशंस कार्यक्रम) की एक रिपोर्ट के म़ुताबिक दुनिया के तमाम हिस्सों में एचआईवी के संक्रमण के नए मामलों में गिरावट आ रही है। इसके अलावा एड्स से होने वाली मौतों में भी 2005 के अपने उच्चतम स्तर से 35 फीसदी की गिरावट आई है। मगर समाज के संवेदनशील तबके पर दंडात्मक कानूनों को आरोपित करना, एचआईवी और एड्स से मुक्त दुनिया के सपने में सबसे बड़ा बाधक है।
समान लिंग वालों के बीच यौन्ा व्यवहार को 78 देशों में अपराध माना जाता है, जबकि सात देशों में इसके लिए मौत की सजा का प्रावधान है।116 देशों में वेश्यावृत्ति को गैरकानूनी माना जाता है। रही बात ड्रग्स की, तो इसे तकरीबन पूरी दुनिया में अपराध माना जाता है। दो अफ्रीकी देशों, नाईजीरिया और यूगांडा ने इसी वर्ष समलैंगिकता विरोधी कानूनों को अपनाया है। एचआईवी के प्रसार में उल्लेखनीय कमी लाने वाले भारत में सर्वोच्च अदालत का हालिया फैसला खासा चर्चा में रहा। दरअसल उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिक व्यवहार को कानूनी जामा पहनाने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकों के बीच यौन व्यवहार को फिर से अपराध की श्रेणी में ला दिया है।
दिक्कत यह है कि बहुत से लोग इन मुद्दों को नैतिक और सांस्कृतिक नजरिये से देखते हैं। मगर सवाल यह है कि इन कानूनों का सार्वजनिक स्वास्थ्य से क्या कोई सरोकार है। भारत में स्वास्थ्य और मानवाधिकार से जुड़े कार्यकर्ताओं ने मेलबोर्न सम्मेलन में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि पुराने औपनिवेशिक कानून (इंडियन पीनल कोड की धारा 377) को बहाल करने से समलैंगिकों को अंडरग्राउंड होने पर मजबूर होना पड़ रहा है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के नजरिये से भी बुरा है, क्योंकि इससे उन तक जानकारी और सेवाओं को पहुंचाने में भी मुश्किल होगी। उनका यह भी कहना था कि बेशक आपके पास फंड और दवाओं की कमी न हो, एड्स से मुक्ति तब तक संभव नहीं, जब तक सबसे ज्यादा प्रभावित तबके के हितों का ख्याल नहीं रखा जाएगा। उन्हें धमका कर रखने से कोई समाधान नहीं निकलेगा।