हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक सुधार का भरोसा दिलाते हुए सर्वोच्च अदालत से सांसदों के खिलाफ चल रहे अदालती मामलों को एक साल के भीतर खत्म करने की अपील की है। चुनावी रैलियों में भी मोदी इस तरह का वायदा कर चुके थे। हालांकि मार्च में सर्वोच्च अदालत भी इस तरह की बात कह चुकी है। ऐसे में विरोधी इसे सरकार की महज श्रेय लेने की कोशिश भर बता सकते हैं। हालांकि यह सवाल पूछा ही जा सकता है कि जब भाजपा राजनीतिक सुधार को लेकर वाकई गंभीर थी, तो फिर दागियों को टिकट ही क्यों दिए गए?
बहरहाल, प्रधानमंत्री के ये आश्वासन कई मायनों में अहम हैं। मौजूदा 16वीं लोकसभा में अकेले भाजपा के ही 63 सांसदों पर हत्या का प्रयास और अपरहण जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। यानी इनमें से अगर कुछ भी दोषी साबित होते हैं, तो सत्तारूढ़ दल को असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि इस मामले में कांग्रेस समेत अन्य दल भी पीछे नहीं हैं। कुल मिलाकर, इस नई संसद में हर तीन में से एक माननीय आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं! ध्यान देने की बात यह भी है कि इस बार चुनावी मैदान में खड़े कुल उम्मीदवारों में केवल 17 फीसदी ही दागी थे, जबकि चुनकर आए 34 फीसदी यानी दोगुना आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं! ऐसे सांसदों की संख्या में 2004 के मुकाबले इस बार नौ फीसदी का इजाफा हुआ है। बढ़ती सामाजिक जागरूकता के दावों के बीच अफसोस की बात है कि संसद में आपराधिक हिस्सेदारी घटने के बजाय बढ़ रही है। लिहाजा जनता को भी अपने फैसलों पर सोचना होगा।
हालांकि सांसद इन मामलों को राजनीतिक साजिश और इस पर हो रही चर्चा को जनादेश का अपमान बताते हैं। लेकिन कुछ इसे समाज में हो रही गिरावट की झलक भी बताते हैं। वैसे राजनीतिक षड्यंत्र से इन्कार भी नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या सारे मामलों में यह सच है? दो ताजा मामले हैं। एलटीसी घोटाले में सीबीआई देश के छह सांसद और पूर्व सांसदों की जांच कर रही है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार के एक मंत्री को गैंगरेप के मामले में अदालती समन भेजा गया है। जाहिर है, राजनीति में नैतिकता की बात अब पुरानी पड़ चुकी है। ऐसे में अदालत का रास्ता ही बचता है। खासकर तब, जबकि राजनीतिक सुधार पर राजनीतिक वर्ग ने अब तक कोई ठोस पहल न की हो। तभी तो गोस्वामी कमेटी, वोहरा कमेटी, इंद्रजीत गुप्ता कमेटी और लॉ कमीशन रिपोर्ट जैसी न जाने कितनी ही रिपोर्टें धूल फांकती रही हैं।
खैर देर आयद दुरुस्त आयद, पर राजनीतिक सुधार का मामला यहीं खत्म नहीं होता। राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने के फैसले के खिलाफ तमाम दल कानून में संशोधन कर चुके हैं। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही के दावों के बीच इस मामले पर भी नए सिरे से सोचना होगा। चुनावी प्रणाली को दोषरहित करते हुए ‘जिताऊ फैक्टर’ के नाम पर किसी को भी टिकट देने की प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि युवा भारत में ढेरों ईमानदार चेहरे स्वच्छ राजनीति से जुड़ना चाहेंगे, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह संभव नहीं होगा। लिहाजा प्रधानमंत्री और सर्वोच्च अदालत को इस मसले में गंभीरता दिखानी होगी।