मैंने हाल ही में वाल्टर क्रोकर की किताब नेहरूः ए कंटम्परेरीज एस्टीमेट फिर से पढ़ी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के जीवन और उनकी विरासत के बारे में यह एकल खंड श्रेणी में श्रेष्ठ किताब बनी हुई है और यह नेहरू के देश के बारे में भी कई दिलचस्प चीजें बताती है। जरा भारत के उस हिस्से के बारे में की गई इस टिप्पणी पर गौर कीजिए, जहां मैं खुद रहता हूं : 'भारतीय गणराज्य में दक्षिण भारत को कम महत्व दिया जाता है। यह भारत का नुकसान है और दक्षिण भारत के साथ यह अन्याय है, क्योंकि दक्षिण को कुछ विशिष्ट महत्वपूर्ण चीजों में उत्कृष्टता हासिल है- यहां अपेक्षाकृत कम हिंसा है, मुस्लिम विरोधी असहिष्णुता कम है, विश्वविद्यालयों में अनुशासनहीनता और अपराध कम हैं; शैक्षणिक मानक बेहतर हैं, शासन बेहतर है और बेहतर स्वच्छता है; भ्रष्टाचार कम है और यहां हिंदू पुनरुत्थानवाद में रुचि कम है।'
क्रोकर द्वारा इन शब्दों को लिखे जाने के आधी सदी बाद अर्थशास्त्री सैम्युल पॉल और काला सीताराम श्रीधर ने एक किताब लिखी, द पैराडॉक्स ऑफ नॉर्थ-साउथ डिवाइड (सेज प्रकाशन, 2015)। आंकड़ों की व्यापक सारणियों का इस्तेमाल कर किताब तर्क करती है कि आर्थिक विकास के मामले में दक्षिण भारत ने उत्तर भारत से काफी बेहतर किया है। पॉल और श्रीधर ने दो तरह की तुलनाएं की हैं। पहले उन्होंने दक्षिण भारत के एक बड़े राज्य तमिलनाडु और उत्तर भारत के एक बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को आमने-सामने रखकर तुलना की। इसके बाद उन्होंने संबंधित क्षेत्रों का दायरा बढ़ाकर चार दक्षिण भारतीय राज्यों— तमिलनाडु, कर्नाटक, अविभाजित आंध्र प्रदेश और केरल की तुलना चार उत्तर भारतीय राज्यों— उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान से की।
पॉल और श्रीधर ने शुरुआत 1960 के आंकड़ों से की, जब तमिलनाडु में प्रति व्यक्ति आय उत्तर प्रदेश की तुलना में 51 फीसदी अधिक थी। 1980 के दशक की शुरुआत में यह अंतर घटकर 39 फीसदी रह गया। हालांकि उसके बाद के दशकों में यह अंतर तेजी से बढ़ने लगा और 2005 में तमिलनाडु का औसत नागरिक उत्तर प्रदेश के एक औसत नागरिक की तुलना में 128 फीसदी अधिक कमाता था। पॉल और श्रीधर ने पाया कि वर्तमान में चार उत्तर भारतीय राज्यों में औसत प्रति व्यक्ति सालाना आय 4,000 डॉलर है, वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों में यह 10,000 डॉलर है, करीब 250 फीसदी अधिक।
पॉल और श्रीधर का विश्लेषण दिखाता है कि दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहां दक्षिण ने उत्तर से बेहतर प्रदर्शन किया है। इनमें से पहला, मानव विकास सूचकांक से संबंधित है, जिसमें महिला साक्षरता दर, शिशु मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा शामिल हैं। दूसरा, तकनीकी शिक्षा, बिजली उत्पादन और सड़कों की गुणवत्ता और पहुंच जैसे आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण क्षेत्रों से संबंधित है।
पॉल और श्रीधर ने यह भी पाया कि शासन के संकेतकों पर उत्तर की तुलना में दक्षिण कहीं बेहतर है। दक्षिणी राज्यों में सरकारी स्कूल और सरकारी अस्पताल बेहतर ढंग से संचालित हैं, जहां स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर कम है और अस्पतालों में डॉक्टर तथा दवाओं का स्टॉक कहीं अधिक है। उत्तर की झुग्गी बस्तियों की तुलना में दक्षिण की झुग्गी बस्तियों में कहीं अधिक और स्वच्छ शौचालय हैं, साथ ही साथ वहां साफ पेयजल की अधिक पहुंच है।
पॉल-श्रीधर की पुस्तक के चौंकाने वाले निष्कर्षों में यह भी शामिल है कि उत्तर-दक्षिण विचलन अपेक्षाकृत हाल का मामला है। वास्तव में आज यह यकीन करना मुश्किल होगा कि 1960 में ग्रामीण गरीबी की घटनाएं उत्तर प्रदेश की तुलना में तमिलनाडु में अधिक थीं। 1980 के दशक से ही दक्षिण ने उत्तर की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करना शुरू किया और 1990 के दशक के बाद यह अंतर बढ़ता ही गया है।
पॉल/श्रीधर का अध्ययन आंकड़ों पर आधारित है। यह काफी हद तक समाजशास्त्रीय या गुणात्मक विश्लेषण को छोड़ देता है। इसने दक्षिण में सामाजिक सुधार आंदोलन के महत्व का सिर्फ सरसरी तौर पर जिक्र किया है और यह हिंदू-मुस्लिम संघर्ष की सापेक्ष अनुपस्थिति की बिल्कुल भी बात नहीं करता है। फिर भी ये कारक निश्चित रूप से यह समझने की कुंजी हैं कि क्यों दक्षिण और उत्तर अपने सामाजिक और आर्थिक विकास में इतने नाटकीय रूप से भिन्न हो गए हैं।
1991 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण शुरू हुआ, तब दक्षिण पहले से इस नीतिगत बदलाव का लाभ उठाने के लिए बेहतर स्थिति में था, क्योंकि उसके पास कहीं अधिक कुशल और स्वस्थ श्रम बल था। 1990 के दशक में और 2000 के दशक में जब तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में फैक्टरियां, इंजीनियरिंग कॉलेज, सॉफ्टवेयर पार्क और दवा उद्योग फल-फूल रहा था, तब उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य सांप्रदायिक और जातिगत संघर्षों के कभी न खत्म होने वाले चक्र में उलझे हुए थे। राम जन्मभूमि आंदोलन के परिणामस्वरूप हिंदुत्व की भयावहता उत्तर में फैल गई, जबकि व्यापक रूप में (हालांकि पूरी तरह से नहीं) यह दक्षिण से दूर रही।
हाल के समय में दक्षिण ने उत्तर से बेहतर क्यों किया, इसे समझने के लिए हमें विस्तृत ऐतिहासिक नजरिया रखना होगा, सिर्फ अतीत के दशकों में ही नहीं, अतीत की शताब्दियों में जाना होगा। तट तक पहुंच और विदेशियों के विजेता के बजाय व्यापारियों और यात्रियों के रूप में आगमन से अन्य जगह के लोगों के प्रति जेनोफोबिक (विदेशी लोगों से भय) के बजाय खुले दिमाग वाला नजरिया पनपा। वर्तमान के करीब आते हुए, चूंकि दक्षिण ने विभाजन की भयावहता का अनुभव नहीं किया, इसलिए यह स्थायी कड़वी विरासतों से भी बच गया है। सामाजिक पक्ष को देखें, तो ब्राह्मण वर्चस्व को दक्षिण में काफी पहले चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी। श्री नारायण गुरु और पेरियार जैसे विचारकों ने जाति और लैंगिक, दोनों ही संदर्भों में समतावादी दृष्टिकोण का रास्ता बनाया।
यह पक्की बात है कि दक्षिण कोई पूर्ण नहीं है। तमिलनाडु के हिस्सों में दलितों को जिस तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है वह उस राज्य और वहां की राजनीतिक संस्कृति को शर्मसार करते हैं। एक दक्षिणी राज्य, कर्नाटक में, हिंदुत्व ने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में लगातार पैठ बनानी शुरू कर दी है, जिसके अच्छे परिणाम कम ही होंगे। और 1960 के दशक में, यह सच हो सकता है कि दक्षिण में भ्रष्टाचार कम रहा हो, अब उदारीकरण के बाद के युग में खनन और बुनियादी ढांचे के अनुबंधों से बड़े पैमाने पर लाभ होने के साथ, हैदराबाद, बंगलूरू और चेन्नई में रिश्वत या कट के प्रति राजनेताओं की लालसा किसी भी जगह के उनके समकक्षों से कम नहीं है।
हालांकि हाल के दशकों में अपने सारे सामाजिक और आर्थिक विकास के बावजूद राजनीतिक संदर्भों में गणराज्य के जीवन में दक्षिण का महत्व कम है। और जल्द ही यह और कम हो सकता है। दरअसल जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों को नए सिरे से आवंटित करने का प्रस्ताव है। यदि ऐसा होता है, तो केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य जो अपने नागरिकों की अच्छी तरह से सेवा करते हैं, केंद्र सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर उनका नगण्य प्रभाव और भी कम होता जाएगा। जो राज्य अपने नागरिकों की उदासीन या अप्रिय ढंग सेवा करते हैं, जैसे कि उत्तर प्रदेश और बिहार, केंद्र सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर उनका पहले से ही काफी प्रभाव और भी बढ़ जाएगा। यह बढ़ती हुई विषमता भारतीय संघवाद की पहले से ही नाजुक स्थिति पर नए बोझ और दबाव डालेगी।