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निवेश के बिना कैसे होगी अच्छी खेती

Thu, 27 Jul 2017 03:04 PM IST
हरीश रावत
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हरीश रावत
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इन दिनों एक गीत की पंक्ति मुझे बार-बार याद आ रही है, कसमे वादे...वादे हैं, वादों का क्या। उत्तराखंड के किसानों के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। राजनेताओं के वायदे बिखर गए हैं। राज्य में इस वर्ष जून से अब तक पांच किसानों ने या तो आत्महत्या कर ली या वसूली के नोटिस से हृदयाघात से मर गए। अभी 15 जुलाई को प्रतापपुर के एक किसान भजन सिंह बैंक के वसूली नोटिस से इतने परेशान हुए कि उन्हें हृदयाघात हुआ, जिससे उनकी मौत हो गई। 24 जून को हल्दीपंचपेड़ा निवासी राम अवतार और 12 जुलाई को बांसखेड़ी के बलविंदर ने आत्महत्या कर ली। सितारगंज और टिहरी के दो किसानों की मौत भी ऐसी ही परिस्थितियों में हो गई।
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ये मौतें सिर्फ किसानों की नहीं, भरोसे की मौत भी हैं। यह भरोसा देश के शीर्ष नेतृत्व ने ऋणमाफी का दिया था। इसके उलट किसानों के सिर पर नोटिस चस्पा है वसूली का। उन्हें चिंता सताती रहती है कि यदि कर्ज अदा नहीं हुआ, तो जमीन नीलाम हो जाएगी।

इस खूंखार वास्तविकता का समाधान क्या है? केंद्र और राज्यों को तात्कालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक, तीनों समाधान पर एक साथ काम करना होगा। इस चुनौती का दुखद पहलू यह है कि केंद्र सरकार किसानों की आत्महत्या और उसके कारणों को अपना विषय मानने को तैयार नहीं है। केंद्रीय वित्त मंत्री ने पल्ला झाड़ते हुए कह दिया है कि किसानों का कर्ज माफ करना राज्यों का विषय है। वास्तविकता यह है कि किसान और खेती से जुड़े प्रत्येक पहलू से केंद्र सरकार का गहरा वास्ता है। क्या आज की स्थिति में भूमि सुधार बिना केंद्रीय नीति के संभव है? क्या खेती के उपकरणों सहित यूरिया-रसायन आदि के मूल्य निर्धारण व उपलब्धता के सवाल से केंद्र सरकार हाथ झाड़ सकती है? क्या पिछले तीन वर्षों में कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य में आई बड़ी गिरावट के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जिम्मेदार हैं?
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देश के कई भागों में माइक्रो ऋण प्रणाली और सहकारिता संस्थाओं का ढांचा लगभग ध्वस्त हो गया है। नाबार्ड सहित बैंकिंग सेवाओं और राज्यों के संबंधित विभागों में समन्वय नहीं है। कृषि और संबद्ध क्षेत्र के ऋणों की ब्याज दरों को और घटाना आवश्यक है और यह कार्य केंद्र सरकार के हाथ में है। इन बिंदुओं का समाधान निकाले बिना किसानों के अच्छे दिन नहीं आने वाले। केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों को कृषि क्षेत्र के सुधार और कृषक कल्याण के लिए एक समग्र राष्ट्रीय कृषि नीति के तहत कार्य करना चाहिए।
 
दूसरी ओर, सरकार के गलत निर्णयों के कारण दूरसंचार कंपनियों पर लगभग 49 अरब रुपये का कर्ज है। उद्योगों पर डूबता हुआ कर्ज लगभग 80 खरब रुपये का है। यह चिंता की बात होनी चाहिए कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने देश के आठ करोड़ किसान परिवारों में से 48.5 फीसदी परिवारों को ऋणग्रस्त बताया है। कृषि उत्पाद के नए क्षेत्र विकसित होने में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, एनएफएसएम और डेरी विकास आदि का बड़ा योगदान रहा है। पिछली दो पंचवर्षीय योजनाओं में तत्कालीन सरकार ने इन योजनाओं में निवेश बढ़ाया, मगर पिछले तीन वर्षों में इनका आवंटन घटा है। उत्तराखंड में ही पिछले वर्ष की तुलना में कृषि क्षेत्र का आवंटन 19 फीसदी घटा है। मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूं कि कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाए बिना आखिर किसान की आमदनी दो गुना करने का कौन सा सूत्र है, जिस पर केंद्र सरकार काम कर रही है!
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