शिक्षा और विज्ञान के बारे में ढेर सारी बातें की जा सकती हैं। क्या शिक्षा और विज्ञान को अलग-अलग देखा जा सकता है या फिर इन्हें विज्ञान में शिक्षा या शिक्षा में विज्ञान के रूप में देखा जाए? मैं समझता हूं कि हमारे पूर्ववर्ती मानते थे कि शिक्षा में, जिसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी शामिल हैं, व्यापक सुधार हो सकता है, यदि इसकी संरचना में प्रौद्योगिकी को जोड़ा जाए। इसके अलावा प्रशिक्षण या अध्यापन में सुधार किया जाए, तो हमारे शिक्षकों और विद्यार्थियों की दुनिया भर की जानकारियों तक पहुंच हो जाएगी। इससे हम दुनिया की महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हो सकेंगे।
तकरीबन पच्चीस वर्षों से मैं सूचना प्रौद्योगिकी को लेकर काफी उत्साहित हूं। मेरा यह उत्साह सिर्फ बाहर से नहीं है। मैंने शिक्षा और संचार के तीनों केंद्रीय पहलूओं प्रौद्योगिकी, प्रणाली और प्रशिक्षण की दिशा में काम किया है। प्रणाली और प्रशिक्षण को लेकर मैंने काफी काम किया है। इसमें काफी सफलताएं मिली हैं, मगर सामाजिक दबाव और निहित स्वार्थों के कारण कुछ नाकामियां भी मिली हैं। मैं आधुनिक प्रौद्योगिकी या तकनीक का विरोधी नहीं हूं, मगर मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि हम न सिर्फ आयातित प्रौद्योगिकी, बल्कि बाहरी जरूरतों के लिए तैयार किए गए पाठ्यक्रम के सहारे आगे बढ़ेंगे, तो हम अपने समाज को काफी नुकसान पहुंचाएंगे। हमारे टेलीविजन पर आने वाले चमकदार विज्ञापनों को देखकर मुझे हैरत होती है। ये सब अंग्रेजी में होते हैं। हमारे जड़हीन मध्य वर्ग की यह जड़हीन भाषा है। इस पर भी हैरत नहीं होती कि अनेक संपन्न निजी स्कूल (जिन्हें पता नहीं क्यों हमारे देश में आज भी पब्लिक स्कूल कहा जाता है) इसी उपक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं, क्योंकि अभिभावकों को भी विदेशी, पाश्चात्य और वैश्विक चीजें आकर्षित करती हैं और श्रेष्ठ लगती हैं।
सूचना की उर्वरता बढ़ सकती है, बशर्ते कि हम इसे अनुभव के साथ महसूस करें। मानसून की पहली बारिश, आम के मौसम में उठने वाली भीनी खुशबू, लीची, चीकू, तरबूज, खुबानी और इतनी सारी चीजें हैं जो गर्मियों को न केवल सहनीय बनाती हैं, बल्कि इनका हम इंतजार भी करते हैं। इसके बजाय हम अप्रैल महीने के 42 डिग्री तापमान के बारे में बात करते हैं, हम पतझड़ के बारे में बात करते हैं, जब कई जगहों पर अधिकांश पेड़ों से सारे पत्ते गिर जाते हैं, उसके बाद पेड़ों पर नए रंगीन फूल खिलते हैं। ऐसा लगता है कि इन सबका शिक्षा से सीधा संबंध नहीं है, जबकि ऐसा नहीं है।
बच्चों के मस्तिष्क को जीवन से जुड़ी चीजों से अलग करने के दो परिणाम हो सकते हैं। पहला यह कि अपने आसपास की दुनिया को देखने, उसे समझने और अपने ढंग से उसकी व्याख्या करने की जरूरत नहीं है, और दूसरा यह कि हमारा जीवन तुच्छ है, जिसमें से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्वपूर्ण समाधान नहीं निकल सकते। ये दोनों ही स्थितियां घातक हैं। जीवन से कटी शिक्षा और विज्ञान, दोनों ही व्यर्थ हैं। हमारी औपचारिक शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या यही है कि यह अलगाव ही हमारी विशेषता बन गई है।
हम यह मानते हैं कि कोई चीज यदि किसी दूर के औद्योगिक देश से आई है, तो वह श्रेष्ठ ही होगी। जबकि हमारे अपने देश में कुछ शानदार पहल की गई है। आखिर हम एकलव्य जैसे जमीनी संगठनों से कुछ क्यों नहीं सीख सकते?