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पड़ताल : कितनी तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था, आंकड़ों से पता चलेगा सच में क्या है हाल

पी. चिदंबरम
Updated Sun, 22 Jun 2025 06:50 AM IST

सार

सबसे तेज गति से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है या यह भारत को गरीबी मुक्त कर विकसित देश बना रही है।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI


यदि सुशासन की अंतिम कसौटी लोगों की भलाई है, तो सवाल यह है कि ‘क्या किसी व्यक्ति के पास भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, परिवहन, पारिवारिक समारोहों और मनोरंजन जैसी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त आय है?’ (मैंने दूसरे खर्चों को छोड़ दिया है, जो बदलते समय के हिसाब से आवश्यक माने जा सकते हैं) सबसे अच्छे आधिकारिक आंकड़े घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस) में उपलब्ध हैं। मेरे विचार में आय के बजाय उपभोग का मापदंड औसत परिवार के जीवन स्तर और गुणवत्ता को मापता है। अंतिम एचसीईएस 2023-24 में आयोजित किया गया था, जिसमें पूरे देश को शामिल किया गया था और 2,61,953 परिवारों (1,54,357 ग्रामीण और 1,07,596 शहरी) से जानकारी एकत्र की गई थी। नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2023-24 में दस साल पूरे कर लिए। एचसीईएस का आंकड़ा बहुत विस्तृत है।


उपभोग : ठोस आंकड़े

सर्वेक्षण का मुख्य बिंदु औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (एमपीसीई) का डेटा है। एक व्यक्ति का एक महीने में उपभोग व्यय उसके जीवन स्तर और गुणवत्ता को दर्शाता है, चाहे वह अमीर हो, गरीब हो या मध्यम वर्गीय। सौभाग्य से ये आंकड़े जनसंख्या के अलग-अलग वर्गों के अनुसार उपलब्ध हैं, अर्थात जनसंख्या को प्रत्येक 10 प्रतिशत में विभाजित

करने के बाद। आंकड़ों के अनुसार, निचले पायदान पर रहने वाले 10 प्रतिशत लोगों के प्रतिदिन का खर्च 50-100 रुपये है। आप स्वयं से यह सवाल पूछिए कि 50-100 रुपये प्रतिदिन में एक व्यक्ति किस तरह का भोजन कर सकता है? वह किस तरह के घर में रह सकता है? वह किस तरह के इलाज या दवाइयों का खर्च उठा सकता है?

  • जनसंख्या का दस प्रतिशत कोई मामूली संख्या नहीं है, ये 14 करोड़ लोग हैं। अगर वे एक अलग देश होते तो जनसंख्या के लिहाज से दुनिया में 10वें स्थान पर होते। इसके बावजूद नीति आयोग और सरकार की ओर से यह दावा किया जाना कि ‘गरीब’ कुल जनसंख्या का केवल 5 प्रतिशत या उससे भी कम हैं। यह बिल्कुल बेमानी है।
  •  सबसे प्रासंगिक तुलना ऊपरी 5 प्रतिशत और निचले 5 प्रतिशत के प्रति व्यक्ति व्यय का अनुपात है। 12 साल पहले यह लगभग 12 गुना था और 2023-24 में भी यह लगभग 7.5 गुना रहा।

किसान और खाद्यान्न : निराशाजनक आंकड़े


सरकार का यह दावा है कि कृषि क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा है, लेकिन क्या किसानों की जिंदगी भी उतनी ही तेजी से बदली है? नाबार्ड के 2021-22 के आंकड़े यह दिखाते हैं कि खेती करने वाले करीब 55 प्रतिशत परिवार कर्ज के बोझ तले डूबे हुए हैं। प्रत्येक परिवार पर औसतन 91,231 रुपये का कर्ज है। लोकसभा में 3 फरवरी, 2025 को दिए गए एक बयान के अनुसार, करीब 13 करोड़ 8 लाख किसानों पर व्यावसायिक बैंकों के 27,67,346 करोड़ रुपये उधार हैं, 3 करोड़ 34 लाख किसानों पर सहकारी बैंकों का 2,65,419 करोड़ रुपये बकाया है और 2 करोड़ 31 लाख किसानों पर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का करीब 3,19,881 करोड़ रुपये बकाया है।


प्रधानमंत्री किसान योजना खामियों से भरी हुई है। इस योजना के तहत अप्रैल-जुलाई 2022 में 10 करोड़ 47 लाख किसान नामांकित थे। 2023 (15वीं किस्त) में यह संख्या घटकर 8.1 रह गई और सरकार ने यह दावा किया कि फरवरी 2025 (19वीं किस्त) में किसानों की संख्या बढ़कर 9.8 करोड़ हो गई। आंकड़ों की यह बाजीगरी सोच से परे है। बटाई पर काम करने वाले किसान इस योजना के पात्र नहीं हैं।


फसल बीमा योजना में यूपीए सरकार ने सुधार कर इसे दोबारा लागू किया। सरकार की ओर से निजी बीमा कंपनियों को अनुमति दी गई और निर्देश दिया गया कि वे इस योजना को ‘नो प्रोफिट, नो लॉस’ के आधार पर चलाएं। दूसरी तरफ, एनडीए द्वारा लागू प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) उगाही वाली योजना बनकर रह गई - एकत्रित सकल प्रीमियम के अनुपात के रूप में भुगतान किए गए दावे 2019-20 में 87 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 56 प्रतिशत हो गए।
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सामाजिक सुरक्षा योजना

मनरेगा को पिछले तीन वर्षों में एक स्थिर आवंटन प्राप्त हुआ है। डेढ़ करोड़ से अधिक सक्रिय जॉब कार्ड निरस्त कर दिए गए। औसत 100 दिनों के काम के बदले मात्र 51 दिनों का काम दिया जा रहा है। मांग आधारित योजना होने के बजाय यह धन की कमी वाली योजना बन गई है।


80 करोड़ लोगों को प्रति व्यक्ति 5 किलो मुफ्त अनाज देने से 10 करोड़ पात्र नागरिक वंचित रह जाते हैं। मुफ्त राशन और मिड-डे मील योजना के बावजूद बच्चों में बौनापन 35.5 प्रतिशत और बच्चों में कमजोरी 19.3 प्रतिशत है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 127 देशों में 105वें स्थान पर है।


विनिर्माण : कमजोर पक्ष

जीवीए में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा 2011-12 में 17.4 प्रतिशत था, जो 2024-25 में घटकर 13.9 फीसदी हो गया है। बहुप्रशंसित उत्पादन प्रोत्साहन योजना एक भयानक विफलता है - 14 क्षेत्रों को 1,96,409 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन केवल 14,020 करोड़ रुपये ही वितरित किए गए हैं।


सबसे तेज गति से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है या यह भारत को गरीबी मुक्त कर विकसित देश बना देगी। भारत को हर दस साल में संरचनात्मक सुधारों, राज्यों को शक्तियों के विकेंद्रीकरण, बड़े पैमाने पर विनियमन, अधिक प्रतिस्पर्धा और सरकार को ‘रास्ते से हटाने’ के लिए एक और खुराक की जरूरत होती है।

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