दुनिया में अर्थव्यवस्थाओं के विकास के साथ शहरीकरण एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। हालांकि शहरीकरण और विकास समानार्थी नहीं माने जा सकते, मगर शहरीकरण मानव विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है। शहरीकरण के माध्यम से विकास की जरूरी शर्त यह है कि शहरों में रहने वाले सभी लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं मिलें और आने-जाने के लिए यातायात सुगम हो। मगर शिक्षा, स्वास्थ्य और यातायात की सुविधा शहरियों को उपलब्ध कराना भी आज सरकार के लिए टेढ़ी खीर बन चुका है। वह सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि की सुविधाओं को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रही है। बढ़ती महंगाई के कारण दो वक्त का भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी सुविधाएं जरूरत के अनुरूप नहीं मिल रही हैं, लेकिन आज शहरों में सबसे बड़ी समस्या रिहायश की है।
यह स्थिति तब है, जब मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में पिछले दशक की तुलना में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी दर्ज की गई है। मुंबई में तो 2001 की तुलना में 2011 में जनसंख्या 5.75 फीसदी घटी है। वहीं दिल्ली में जनसंख्या पिछले दशक में 21 फीसदी की दर से बढ़ी, जबकि उससे पहले वाले दशक में 47 फीसदी की दर से वृद्धि दर्ज की गई थी। देश के विभाजन के बाद दिल्ली में आकर बसने वाले लोग मात्र 500 रुपये में रहने लायक मकान खरीद सकते थे। ऐसा वे थोड़ा बहुत जेवर बेचकर भी जुटा लिया करते थे। आज दिल्ली आने वाले प्रवासियों के बस का नहीं है कि वे फ्लैट या जमीन खरीद सकें।
यों तो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बंगलूरू जैसे महानगरों में घर बनाना कभी भी आसान नहीं था, लेकिन पिछले दो दशकों में तस्वीर बिल्कुल बदल गई है। दिल्ली में ही बीते दो दशकों के दौरान जमीन की कीमत में 130 गुणा तक वृद्धि देखी जा सकती है। इसमें कालेधन की बड़ी भूमिका है। ऐसा माना जाता है कि सोने और जमीन में ही कालेधन का सबसे अधिक निवेश किया जाता है। क्या यह महज संयोग है कि हाल के वर्षों में जब टू जी, कोयला और राष्ट्रमंडल जैसे लाखों करोड़ रुपये के घोटाले सामने आए, दिल्ली और उसके आसपास जमीन और फ्लैट की कीमतें आसमान छूने लगीं!
गौरतलब है कि दिल्ली के समीप गुड़गांव में जमीन की कीमतों में पिछले पांच वर्षों में 10 से 15 गुणा उछाल आ चुका है। बड़े पैमाने पर विदेशियों द्वारा रियल इस्टेट में निवेश करने के कारण भी जमीनों की कीमतों में उछाल आया है। अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय भारत में प्रति व्यक्ति आय से लगभग 35 गुणा ज्यादा है। लेकिन जब हम घरों की कीमत का अंदाज लेते हैं, तो पाते हैं कि अमेरिका के वाशिंगटन डीसी, न्यूयॉर्क और शिकागो सरीखे नामी शहरों में भी 1000 वर्ग फुट का एक फ्लैट मात्र पांच लाख डॉलर (करीब तीन करोड़ रुपये) में उपलब्ध है, जबकि भारत की राजधानी दिल्ली में इतना बड़ा फ्लैट 60 लाख से एक करोड़ रुपये (एक लाख डॉलर से 1.8 लाख डॉलर) या उससे भी कहीं ज्यादा कीमत पर मिलता है।
ऐसे में यह समझना कठिन नहीं कि शहरों, खासतौर से महानगरों में सीमित आय वाले लोग खुद के आशियाने के बारे में सोच भी नहीं सकते। विडंबना यह है कि जमीन और मकान की कीमतों में वृद्धि के पीछे कृत्रिम कारण कहीं अधिक जिम्मेदार हैं। शहरी जमीन की कीमत को थामने के लिए सरकार को जमीन की सही कीमत के आधार पर रजिस्ट्री की अनुमति दी जानी चाहिए। कालेधन के साथ जमीन की खरीद-फरोख्त करने की अनुमति से कीमतों में अनाप-शनाप वृद्धि होती है, क्योंकि काला धन खपाने के उद्देश्य से भ्रष्ट लोग जमीन की कीमतों को बढ़ाने का काम करते हैं।
सरकार को सर्किल रेट, बाजार भाव तक बढ़ा कर, रजिस्ट्री शुल्क की दर को आनुपातिक रूप से घटा देना चाहिए, जिससे सरकार की आमदनी में कोई कमी होगी नहीं और कालेधन की स्वीकार्यता समाप्त हो जाएगी। देश में कालेधन और भ्रष्टाचार को समाप्त करने की ओर भी यह महत्वपूर्ण कदम होगा। इसके अलावा गरीबों को उचित कीमत पर घर तब तक नहीं मिल सकता, जब तक सरकार स्वयं भूखंड काट कर जरूरतमंदों को और गरीबों के समूहों को आवंटित न करे।