एक महीने पहले तक मैं होली के बेहद रंगीन सपने देख रहा था कि इस बार रंग लाऊंगा, पिचकारी लाऊंगा, गुब्बारे भरूंगा और जिन लोगों पर पिछले बरस रंग न डाल पाया, जिनके माथे पर गुलाल न लगा पाया, जिनको गले न लगा पाया, इस बार लगाकर रहूंगा। लेकिन मैं क्या करूं? होली से ऐन पहले कमबख्त कोरोना अपनी ‘डबल म्यूटेंट’ की दुनाली दिखाकर फिर से हमें डरा रहा है कि खबरदार! बाहर न निकल, मास्क पहन, दो गज की दूरी रख और लगातार हाथ धोता रह! मैं सोचता हूं कि इस बार कोरोना लाख मना करे, तो करता रहे, हम तो कम से कम अपने मन की होली मन ही मन खेलेंगे ही! मन पर भला किसका कंट्रोल है?
इसलिए इस बार हम मनसा होली खेलेंगे और मन भरकर खेलेंगे। पिछले बरस दुष्ट कोरोना ने हमें बहुत सता लिया, लेकिन हम अब न सतेंगे। इस बार हम मन से होली खेलेंगे और जमकर खेलेंगे। यों भी असली होली तो मन में ही होती है। तन पर तो वह बाद में आती है। पहले तो मन में ही आती है। होली का मौसम है। होली हवा में है। सबका होली का मूड है। शायद इसीलिए कोरोना की ‘डबल’ धमकी के बावजूद सब लोग होली खेल रहे हैं। वे ऊपर से होली खेलने से मना कर रहे हैं, लेकिन अंदर-अंदर खेल रहे हैं और एक दूसरे पर ऐसे-ऐसे पक्के रंग डाल रहे हैं, जो छुड़ाए नहीं छूटते।
जिस तरह से ब्रज के बरसाने की लठमार होली एक महीने पहले से ही शुरू हो जाती है और बाद तक चलती रहती है, उसी तरह इस बार मुंबई की लठमार होली महीनों पहले से शुरू हो चुकी है। यह होली लठमार तो है ही, गोलीमार और गालीमार और तालीमार होली भी है। बरसाने की होली देखने के लिए दुनिया आती है। लेकिन मुंबई वाली होली को दुनिया लाइव देख रही है। जरा मुंबई के ‘हुरिहारों’ के ‘हो हो होलिका’ भाव तो देखिए कि इधर कोरोना ने धमकाया कि मैं डबल खतरनाक होकर आ रहा हूं, उधर मुंबई के निडर ‘हुरिहारे’ बोले : तेरी ऐसी की तैसी! हम तो खेलेंगे राजनीति की होली! वाजे वाली होली! परमबीर वाली होली! विस्फोटक होली, अंबानी को डराने वाली होली, देश को हिला देने वाली होली! कहते हैं कि एक दिन एक सरकार ने वाजे से होली खेली। वाजे ने पलटकर अपने दोस्त मनसुख से होली खेली, लेकिन खेलते हुए शायद रंग कुछ ज्यादा पड़ गया और बेचारा मनसुख उसी में डूब गया। अब दूसरे ‘होली एक्सपर्ट’ जांच कर रहे हैं कि ऐसा ‘मारक रंग’ आखिर किसने लगाया?
कहते हैं कि सरकार ने एक दिन होली के मूड में आकर, वाजे के रंग को हल्का करने के लिए, मुंबई के सबसे बड़े पुलिस अफसर परमबीर से ही होली खेलनी शुरू कर दी। फिर एनआइए अपनी पिचकारी लेकर आ गई और जांच पर मारने लगी। यह है नेताओं की लठमार होली, जो बरसाने से वाया दिल्ली, मुंबई आ गई और जो रोज ‘षड्यंत्र-षड्यंत्र' खेल रही है। एक सरकार दूसरी सरकार पर रंग डाल रही है और पोंछ रही है। बहसा-बहसी में इस कदर गुलाल उड़ता है कि मालूम ही नहीं चलता कि किसने किसके गाल पर मला, किसने किसके माथे पर मला और किसने किसको छला? कोरोना लाख कहे कि घर से बाहर न निकल, मास्क लगा, दो गज की दूरी रख, हाथ साफ रख, लेकिन नेता और जनता, दोनों ने ठोड़ी पर मास्क लटकाकर ‘नई फैशन’ चला दी है, अब सब ‘रंग मारने लायक दूरी’ रखते हैं और दूसरों के रंग पर ‘हाथ
साफ’ करते रहते हैं।
इस तरह 'कोरोना-उचित-आचरण’ भी हो गया और होली भी हो गई! मुंबइया होली से भी अधिक मजेदार है बंगाल की लठमार होली, गोलीमार होली, गालीमार होली, तोलाबाज होली, कट मनी होली यानी ‘खेला हौबे होली’! वहां कहीं नंदीग्राम की ‘पैर तुड़वा’ होली है, तो कहीं ‘हाथ जुड़वा’ होली है, कहीं ‘व्हील चेयर होली’ है, तो कहीं पर ‘रोड शो होली’ है! इधर से अमित शाह पिचकारी मारते हैं, तो उधर ममता दीदी गुब्बारे मारती हैं। कहीं ‘जयश्री राम’ की पिचकारी चलती है, तो कहीं 'चंडीपाठ’ की पिचकारी चलती है।
यों तो तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और असम में भी इन दिनों चुनावी होली जोर-शोर से खेली जा रही है। लेकिन जो रंग बंगाल के चुनाव में खिल रहे हैं, वैसे पक्के रंग और कहीं नहीं खिल रहे। एक ओर गाली है, तो दूसरी ओर ताली है। बंगाल में ‘सिंदूर खेला’ चल रहा है और जमकर रंग बरस रहा है। चुनरवारी भीग रही है और हुरिहारों को भी गरिया रही है! बंगाल की लठमार होली दरअसल अभी पूरे महीने चलनी है और रंग बरसते रहना है। तभी जाकर यह मालूम होगा कि किसका रंग कितना पक्का रहा!
कोरोना सिर्फ एक महामारी नहीं है। वह एक राजनीतिक, आर्थिक और जैविक राजनीति भी है, जो दुनिया भर के लोगों के चेहरे और व्यवहार को अपने तरीके से कंट्रोल करना चाहती है। इसीलिए इस बार हमें कोरोना के खिलाफ भी होली खेलनी चाहिए। तभी जाकर कोरोना का कोप खत्म होगा! कोरोना चीन का बनाया हुआ ‘जैविक हथियार’ है और हमारी कल्चर का दुश्मन है। यह चीन का बना हुआ है और चीन नहीं
चाहता कि हिंदुस्तानी खुलकर होली खेलें। 'पैंगोंग’ में वह हमारी खेली होली का स्वाद चख चुका है, इसलिए भी चीनी कोरोना अपने ‘डबल म्यूटेंट’ से डरा रहा है। वह जनतंत्र का भी दुश्मन है। लेकिन भारत भी आखिर क्या करे?
इधर तो जनतंत्र है। चुनाव जरूरी हैं। चुनाव होंगे, तो भीड़ होगी ही। कोरोना का कोप बढ़ेगा ही, लेकिन अब तो टीका भी लगने लगा है। पिछले साल के अनुभव के बाद लोग भी होशमंद हो चुके हैं और ‘डेथ रेट’ फिर भी कम है। आम जनता सोचती है कि वह अपना जीवन जिए कि कोरोना से डरती रहे! अपनी जनता डरकर मरने की जगह लड़कर मरना बखूबी जानती है। यही होली भाव है। नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक गेब्रियल गार्सिया मार्खेज ने अपने वक्त में लव इन द टाइम्स ऑफ कॉलरा लिखकर लोगों को यह हिम्मत दी थी कि महामारी के घोर संत्रास भरे दिनों में भी प्रेम किया जा सकता है। उसी की तर्ज पर मैं भी ‘कोरोना के मौसम में होली’ लिखकर लोगों के होली भाव को उकसा रहा हूं कि होली होली है। जब हिरण्यकशिपु की निरंकुशता के बीच भक्त प्रहलाद बुआ से होली खेल सकता है, तो फिर अपन लोग कोरोना की निरंकुशता के बीच आखिर होली क्यों नहीं खेल सकते?