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इतिहास तय करेगा इंदिरा की शख्सियत

प्रदीप कुमार Updated Sun, 19 Nov 2017 11:55 AM IST
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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
सौ साल पहले जब आनंद भवन में इंदिरा गांधी का जन्म हुआ था, उस मध्य आकार के प्रासाद में प्रसन्नता नहीं हुई थी। इंदिरा की  चर्चित जीवनीकार कैथरिन फ्रैंक लिखती हैं कि आनंद भवन के बरामदे में भीड़ के बीच निराशा की लहर फैल गई थी। बड़े होने पर इंदिरा गांधी ने अपने जन्म को इस तरह पेश किया, 'मेरा परिवार इतना रूढ़िवादी नहीं था कि बच्ची के जन्म को दुर्भाग्य माने, फिर भी बच्चे के जन्म को एक विशेषाधिकार और आवश्यकता के रूप में देखा जाता था।'


चार पाउंड की यह बच्ची आकर्षक भी नहीं थी।  बुआ विजय लक्ष्मी तो उन्हें बदसूरत कहा करती थीं। अक्सर बीमार रहने वाली, घर में उपेक्षित मां कमला और आजादी की लड़ाई में कूद चुके पिता जवाहर लाल और दादा मोतीलाल नेहरू का साथ बीच-बीच खोने वाली इंदिरा का बचपन असुरक्षाओं और अनिश्चितताओं  के साथ गुजरा। इससे उत्पन्न ग्रंथियां इंदिरा के व्यक्तित्व का स्थायी भाव बन गईं।


शायद इन्हीं ग्रंथियों के कारण इंदिरा कभी निस्तेज दिखीं (डॉ. राम मनोहर लोहिया के शब्दों में गूंगी गुड़िया) तो कभी अनुप्राणित करने वाली शक्ति पुंज। लेकिन उनका प्रभावशाली गुण यह था कि संकट में वह 'त्रिशूलधारिणी' बन जाती थीं।


विवादों से परिपूर्ण किसी व्यक्ति का सर्वसम्मत मूल्यांकन कठिन होता है। निष्कर्ष मूल्यांकन करने वाले पर निर्भर होता है। यह बात इंदिरा पर बखूबी लागू होती है। इंदिरा के शासन काल का सबसे बड़ा विवाद है आपातकाल। अधिनायकवादी कदम उठाने वाली इंदिरा को लोकतांत्रिक कैसे माना जाए? संभव है, भविष्य का इतिहासकार पूर्ण सत्य की खोज में आगे जाए। 


इस प्रश्न का उत्तर आग्रह-दुराग्रह से मुक्त, भविष्य ही दे पाएगा कि जब जनादेश प्राप्त सरकारों को बलात गिराया जा रहा हो, पूरे देश में अनास्था का माहौल पैदा किया जा रहा हो और सेना-पुलिस से बगावत की अपील की जा रही हो, तब क्या किया जाना चाहिए? सेनाध्यक्षों की निंदा कर उनका मनोबल गिराए जाने या सेनाओं को अवज्ञा के लिए उकसाए जाने की स्थितियों में मूक रहने वाली सरकार कर्तव्य अपरायणता की दोषी होगी या नहीं?


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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा के फैसले के बाद इंदिरा को इस्तीफा देकर नया जनादेश प्राप्त करने की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए था। तब तक विपक्ष चुनाव लड़ने के लिए एकजुट नहीं था और कांग्रेस में भी एकता थी। जनता के बीच इंदिरा की साख बनी हुई थी, जो आपातकाल के बाद हुए चुनाव के समय काफी हद तक खत्म हो गई। 


जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा और अन्य के कांग्रेस छोड़ देने से स्थिति और प्रतिकूल हो गई। गुजरात से लेकर बिहार और दिल्ली तक विपक्ष के प्रहार झेल रही इंदिरा तब तक संतुलन खो चुकी थीं। कांग्रेस में मौजूद चापलूसों और निहित स्वार्थों की जकड़बंदी ज्यादा ताकतवर साबित हुई। आपातकाल का सच केवल इतना है? 
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उस अवधि में भारत के लिए पैदा किए जा रहे खतरों पर 'रॉ' की रिपोर्टें गोपनीय हैं। इंदिरा अंतरराष्ट्रीय सूबेदारों की प्रबंध क्षमता से परे थीं। उस दौरान नई दिल्ली स्थित अमेरिकी, सोवियत और ब्रिटिश मिशनों में तैनात गुप्तचरों की रिपोर्टें कभी प्रकाशित हों, तो नए तथ्य सामने आ सकते हैं। तब तक आपातकाल का पूरा सच अंधेरे में रहेगा।


इंदिरा पर दूसरा गंभीर आरोप यह है कि उन्होंने संस्थाओं, खासतौर से कांग्रेस को अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए तोड़ा। यहां इस सच की अनदेखी कर दी जाती है कि उन्होंने उस काम को किया, जो उनके पिता नेहरू नहीं कर पाए थे। उन्हीं के शब्दों में, 'मैं अपने पिता जैसी नहीं हूं।' प्रिवी पर्स, बैंक राष्ट्रीयकरण, भूमि सुधार, बंधुआ मजदूरी जैसे मुद्दों पर सिंडिकेट के नेता अलग राय रखते थे। विदेश नीति पर भी गहरे मतभेद थे। भारत के परमाणु कार्यक्रम तक का वे विरोध करते थे। यह इंदिरा का राजनीतिक कौशल था कि कई विवादों को उन्होंने जनता बनाम विपक्ष का जामा पहना दिया। कौन राजनेता यह नहीं करना चाहेगा? 


पार्टी प्रोग्राम पर फूट कोई पहली बार नहीं पड़ी। अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी इसका शिकार हुई। सोशलिस्ट पार्टियां इसी पर बनती बिगड़ती रहीं। जनसंघ अध्यक्ष पद पर रह चुके बलराज मधोक को पार्टी से बाहर होना पड़ा था। अटल बिहारी वाजपेयी से मतभेदों के कारण संघ परिवार में अच्छी हैसियत वाले गोविंदाचार्य को पार्टी छोड़नी पड़ी। और तो और वक्त आने पर लाल कृष्ण आडवाणी जैसे पार्टी निर्माता को भी निष्क्रिय होना पड़ा। 


भारत में सिक्किम का विलय, बांग्लादेश की स्थापना और पोकरण-1 इन तीन उपलब्धियों के उल्लेख बिना न तो इंदिरा का सम्यक मूल्यांकन हो सकता है और न भारतीय इतिहास का। सिक्किम के महत्व को हमने दोकलम संकट के दौरान देखा, जब भारत के कड़े रुख ने चीन को पीछे हटने को बाध्य कर दिया। 


उससे पहले इसी सिक्किम में चीन सीमा पर इंदिरा ने चीनी सैनिकों को दौड़ाकर मार गिराने का आदेश देकर सेना और समूचे देश का मनोबल बढ़ाया था। इंदिरा के व्यक्तित्व-कृतित्व का विश्लेषण शुद्ध राष्ट्रीय हितों की कसौटी पर किया जाए, तो बेशक वह इतिहास में एक बहुत बड़ी लकीर हैं।
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