भारतीय सेना पूरी दुनिया में अपने पेशेवर अंदाज, दृढ़ता और बेहतर आचरण के लिए जानी जाती है। इसे उस उपमहाद्वीप की एकमात्र गैर-राजनीतिक सेना होने का गौरव प्राप्त है, जहां सेना सरकार पर हावी होने के लिए कुख्यात हैं। एक लोकतांत्रिक परिवेश में इसने अपना जज्बा अब भी बरकरार रखा है, हालांकि सरकार की तरफ से इसे कमतर बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई है। यह अफसोस की बात है कि जिस भारतीय सेना का सम्मान पूरी दुनिया करती है, खुद वहां के अपने नौकरशाह और राजनीतिक विश्लेषक इसे निशाना बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
ऐतिहासिक तौर पर देखें, तो भारतीय सेना ने ब्रिटिश काल में दोनों विश्वयुद्धों में और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र के कई अभियानों में हिस्सा लिया है। जहां कहीं भी इसे काम करने का मौका मिला, इसने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। हाल ही में इस्राइल ने हाइफा के युद्ध के लिए 'भारतीय सैनिक' के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया है। गौरतलब है कि 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। गौरतलब है कि इस्राइल के समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इस्राइल के निर्माण की नींव पड़ी थी। इसी तरह बांग्लादेश की मुक्ति में भारतीय सेना का प्रदर्शन सैन्य इतिहास के अध्ययन का विषय बना हुआ है। भारतीय सेना की छवि एक ऐसे सैन्य बल की है, जिसने अपनी जिम्मेदारियों को पूरे आत्मविश्वास के साथ निभाया है।
हालिया वर्षों में भारतीय सेना विभिन्न राष्ट्रों के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास कर रही है। भारत, जापान और अमेरिका के साथ होने वाले मालाबार नौसेनाभ्यास का मकसद चीन को कड़ा संदेश देना है। अब इसमें ऑस्ट्रेलिया के भी शामिल होने की उम्मीद है। इस संयुक्त सैन्य अभ्यास पर चीन ने हमेशा टेढ़ी नजर रखी है, क्योंकि वह भारत की नौसैन्य शक्ति को अपने लिए एक खतरे की तरह देखता है।
यही नहीं, भारत दूसरे देशों की सेना के लिए प्रशिक्षण के अवसर भी उपलब्ध करा रहा है। इन प्रशिक्षणों को ग्रहण करने वाले दूसरे देशों के सैनिक भारतीय सैनिकों के साथ जीवन भर रहने वाला एक जुड़ाव साथ लेकर लौटते हैं। यह जुड़ाव, शिष्टता और भारतीय संस्कृति को निकट से समझने का मौका दूसरे देशों के इन सैनिकों के मन में भारतीय सेना और भारत के प्रति एक आदर भाव पैदा करता है। हालांकि शायद ही कभी कोई ऐसा होता हो, जब प्रशिक्षण के दौरान भारतीय सेना दूसरे मुल्कों के सैनिकों को अपने पेशेवर अंदाज की चमक न दिखाती हो।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सेना को एक नई पहचान दिलाने के इन प्रयासों का उद्देश्य है कि इसकी 'सॉफ्ट पावर' को बढ़ाया जाए। भारतीय सेना की 'सॉफ्ट पावर' को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि अफगानिस्तान की सेना भारतीय सैन्य संस्थानों में प्रशिक्षण ले रही है। इस प्रशिक्षण से अफगान सेना को जो अनुभव, ज्ञान, हथियारों की समझ और भारतीय सेना को निकट से समझने का मौका मिलेगा, जिससे वह इतनी काबिल हो सकेगी कि पाकिस्तान की ओर से मिलने वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सके। जब पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख ने अपनी अफगानिस्तान यात्रा के दौरान वहां की सेना को प्रशिक्षण देने की इच्छा जाहिर की, तब अफगानिस्तान की ओर से उन्हें कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं मिली। चीन के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद भारत और चीन की सेना एक-दूसरे की धरती पर संयुक्त सैन्याभ्यास करती रहती हैं। इससे दोनों ही मुल्कों को एक-दूसरे की क्षमता और पेशेवर रवैये को समझने का मौका मिलता है। जब तक सीमा विवाद का कोई हल नहीं निकलता, दोनों देशों के बीच आने वाले वर्षों में तनातनी तो बनी रहेगी, लेकिन बात फिर भी युद्ध तक नहीं पहुंचेगी, क्योंकि दोनों देश जानते हैं कि एक-दूसरे को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
भारतीय सेना की 'सॉफ्ट पावर' अपने चढ़ाव पर है। हालांकि सर्वविदित है कि आयातित हथियारों के दम पर कोई भी देश कभी महाशक्ति नहीं बन सकता, लेकिन फिर भी भारतीय सेना ने हर बार हर मोर्चे पर अपना दम दिखाया है। सैन्य 'सॉफ्ट पावर' अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, हालांकि भारत सरकार इस दिशा में कदम बढ़ाने से हिचकती आई है। दरअसल, आंतरिक या फिर बाहरी संकटों से जूझ रहे देशों में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को सहारा देने के लिए सेना की भूमिका बढ़ जाती है। ऐसे देशों की सेना के साथ संपर्क बढ़ाकर हमारा सैन्य नेतृत्व कूटनीतिक संबंधों को मजबूत बना सकता है। बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड और फिलीपींस के अलावा सुदूर में बोको हराम से लड़ रहे अफ्रीकी देश ऐसे ही कुछ देशों के उदाहरण हैं।
सेना की 'सॉफ्ट पावर' का ठीक ढंग से उपयोग करने के लिए संयुक्त सैन्याभ्यासों का सही समय पर होते रहना और दूसरे देशों को समय पर कोर्स उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है। मगर इसके लिए सेना और विदेश मंत्रालय के बीच सटीक तालमेल अनिवार्य है। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता क्योंकि सैन्य बल रक्षा मंत्रालय का हिस्सा न होकर उसके अधीन जैसी भूमिका में होते हैं। ऐसे में सूचनाओं के प्रवाह में विलंब होता है, जिससे सारा तालमेल धरा का धरा रह जाता है।
पूरी दुनिया में बढ़ते खतरों के मद्देनजर अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग ज्यादा जरूरी हो गया है। हालांकि किसी अंतरराष्ट्रीय संकट के मामले में अपनी सेना के बेवजह हस्तक्षेप जैसी भारत की कोई मंशा नहीं है, बशर्ते कोई अभियान संयुक्त राष्ट्र के ध्वज तले न हो रहा हो, या फिर भारतीय हितों की सुरक्षा का सवाल न हो। भारत को अपनी सैन्य 'सॉफ्ट पावर' का उपयोग करना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का दायरा भी बढ़ाना चाहिए। ऐसा हो सके इसके लिए जरूरी है कि सरकार के भीतर संवाद और वार्ता से जुड़ी जो वर्तमान अड़चने हैं, उन्हें दुरुस्त किया जाए और सैन्य बलों को ज्यादा स्वतंत्रता दी जाए।